वास्तु निघण्टु 45 देवता व उनके गुणधर्म

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ब्रह्मा

परिचय:

वास्तु के मध्य स्थान को ब्रह्म स्थान कहते है। किसी भी स्थान या क्षेत्र का मध्य स्थान नाभी होता है इसे सेन्टर या न्यूक्लीयस भी कहते है। सारी सृजन की प्रक्रिया, प्रकृति में निर्माण, मध्य से सेन्टर या रिक्त खाली स्थान से सृजन की प्रकिया आरम्भ होती है। बीज के मध्य में जो रिक्त या खाली स्थान होता है वहीं से पौधे या वृक्ष की उत्पत्ति होती है।

                जो ब्रह्म स्थान है यह वास्तु में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। जैसे बच्चा जब माता के गर्भ में होता है तो उसे सारा पोषण उसकी नाभी में जुडी हुई प्लेसेन्टाकार्ड से ही मिलता है ठीक उसी प्रकार पूरे वास्तु को सारा पोषण इस नाभी या ब्रह्मस्थान से ही मिलता है। इसका सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होना साफ-सुथरा होना पवित्र होना अत्यन्त आवश्यक है।

देवता का प्रतिमा विज्ञान-  ब्रह्मा सृजन के देवता है सृजन के कारण या सृजन के समय उनका रंग सुनहरा या लाल कहा है। सृजन के पश्चात वे सदा सफेद रंग में रहते है। प्रत्येक देवता की ऊर्जा उनकी शक्ति के माध्यम से कही गई है। उस देवता की शक्ति (पत्नी), अस्त्र-शस्त्र, आयध, रंग, भोजन, वाहन आदि के माध्यम से उस देवता के गण या प्रकृति या स्वभाव को बताया गया है।

ब्रह्माजी का वाहन हंस है। प्रतिमा विज्ञान के अनुसार ब्रह्माजी के चार मुख बताए गए है जो पूर्व आदि मुख्य दिशा में स्थित है। उनका पूर्व दिशा में मुख ऋग्वेद कहा है जो मूल, नींव, आधार या सिद्धांत को प्रदर्शित करता है। उनका दक्षिण दिशा का मुख यजुर्वेद कहा है। पश्चिम मुख सामवेद, उŸार मुख अथर्ववेद को प्रदर्शित करता है।

ब्रह्म स्थान का पूर्वी भाग यदि अशुभ हो तो कार्य का आधार या सिद्धांत या नींव कमजोर होगी जिसे कहते है कि उसमें अपरिपक्वता होगी लम्बे समय तक नहीं चलेगा। यदि दक्षिण भाग अशुभ हुआ तो कार्य को क्रियान्वित करने में कठिनाई होगी पश्चिमी भाग अशुभ हुआ तो क्रम बार-बार भंग होगा कार्य में बाधा होगी। इसी प्रकार ब्रह्म स्थान का उŸारी भाग अशुभ होने पर फिनिश्ड प्रोडक्ट में (व्यवहारिकता में) कमी रहेगी अर्थात उसके विपणन याने विक्रय आदि (पेमेन्ट आदि) में रुकावट होगा।

                ब्रह्माजी के वस्त्र श्वेत या सफेद है। जो की शान्ति, कीर्ति, सौभाग्य, मोक्ष आदि को प्रदर्शित करते है। ब्रह्म स्थान के शुभ होने पर व्यक्ति उत्साही होता है।

 उपयोग

                इसके अतिरिक्त इस स्थान का उपयोग सभा, कोई बड़ा आयोजन जैसे कथा, विशेष पूजा, उत्सव, विवाह आदि के लिए करना चाहिए। यदि यह स्थान खुला हो तो तुलसी आदि का पौधा लगाकर सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित करना चाहिए। मंदिर, लिविंग रूम बनवाना चाहिए।

दोष के लक्षण –

                ओफिस फैक्ट्री इंडस्ट्री आदि के ब्रह्म स्थान पर दोष होने से कार्य में रुकावट आकर गति रुक जाती है, बनाई गई योजनाएं चालू नहीं हो पाती है शुरू नहीं हो पाती है या रुक जाती है। ब्रह्म स्थान में दोष होना अनर्थकारी है। इस स्थान पर दोष होने से शरीर में हृदय नाभि पेट से संबंधित घातक रोग होने की आशंका रहती है ऐसा  शास्त्र का कहना है ब्रह्म स्थान का संबंध सृजन  से भी है इसलिए इस स्थान पर दोष होने पर संतान उत्पत्ति में बाधा रहती है।

क्या ना हो –

शौचालय, सेप्टिक टैंक, गंदे पानी का खड्डा व पाइप लाइन सीढ़ियां नकारात्मक ऊर्जा की वस्तु जैसे झूठे बर्तन,  चप्पल-जूते, स्टोर, फालतू सामान आदि नहीं रखना चाहिए। बहुत भारी सामान, लोहे का फर्नीचर आदि रखना भी शुभ नहीं है, ब्रह्म स्थान के मध्य में कोलम यह बीम या दीवार नहीं होना चाहिए। इस स्थान पर काले, नीले, ग्रे, भूरे, गहरे रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

दोष –

उंचा-नीचा होना, गन्दगी होना, टूट-फूट होना। चोर, पक्षी, कीडे, दीमक आदि में सुरक्षित रखना चाहिए।

उपाय –

जो दोष हो उसे पहले दूर करें। जैसे गंदगी, टूट-फूट, कटा-फटा, बदबू आदि होने पर और उसे दूर करें।

वर्ष में एक बार हवन अवश्य करें। वास्तु शांती अवश्य करना चाहिए।

सफेद कमल, खीर, गाय का दूध, घी व शहद धानी का हवन करें।

घर के मध्य को सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित करें इसके लिए एक शुभ चिन्ह आयुक्त मंजूषा में रत्न, औषधि, खनिज सोना व पारा ब्रह्म स्थान में भूमि के अंदर लगवाना चाहिए।

सुगंधित जल (चन्दन, केसर, कमल आदि से युक्त) का प्रतिदिन छिड़काव करना चाहिए।

घर के मध्य स्थान पर प्रतिदिन गूगल, कपूर आदि की धूप करनी चाहिए।

इस स्थान पर सफेद व हल्के रंग का प्रयोग करना चाहिए।

कार्य को आरंभ करने के लिए लाल रंग का प्रयोग करना चाहिए। कुमकुम आदि का प्रयोग ब्रह्म स्थान पर करने से भी लाभ प्राप्त होगा।

आर्यमा

आदित्य – समरांगण सूत्रधार मे आर्यमा का निघण्टु आदित्य दीया है आदित्य का अर्थ है अदिति के पुत्र। अदिति देवताओं की माता है, दक्ष की पुत्री है।

प्रतिमा विज्ञान –

आदित्य का रंग लाल है यह सृजन के लिए उपयुक्त है। सूर्य के वस्त्र का रंग सिंदूर के समान है। सूर्य के सेवक दंड व पिंगल है। इनके सिर पर सूर्य के हाथ हैं। दंड- दंड (सजा) को प्रदर्शित करता है। यम शब्द का अर्थ एवं व नियम से है कंट्रोल से है। यम का अर्थ जोड़ा है। यम का अर्थ सारथी है।

इंद्र मन है यह गण मन के नियंत्रण को प्रदर्शित करता है।

प्रतिमा विज्ञान के अनुसार सूर्य के चारों और सभी ग्रह बनवाना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि सारे ग्रह सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित हैं। सूर्यदेव की चार पत्नी राजी, रिक्षुभा (निक्षुभा) छाया व सुवर्चसा है। छाया का अर्थ प्रकाश व अंधेरा है यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

आर्य, आर्यक व आर्यमा के नाम से शास्त्र में कहा गया है। आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ से है। नीतिज्ञ है – नीति को जानने वाले (सही गलत की पहचान करने वाले) उनके लिए यह स्थान बताया गया है। इसे आप रणनीतिकार भी कह सकते हैं। किसी ऑफिस, फैक्ट्री आदि में नीति बनाने वाले प्लानिंग करने वाले आदि वरिष्ठ व्यक्ति के लिए यह श्रेष्ठ स्थान है।

पद गुण –

इसके शुभ होने पर व्यक्ति उत्साही, सम्मानित, आदरणीय, पवित्र व सभ्य होता है।

उपयोग –

जो आदरणीय हैं, वरिष्ठ हैं, श्रेष्ठ हैं, अनुभवी हैं, नीतिज्ञ हैं, नीति को जानने वाले उनके लिए यह स्थान बताया गया है। इसे आप रणनीतिकार भी कह सकते हैं। किसी ऑफिस फैक्ट्री आदि में नीति बनाने वाले प्लानिंग करने वाले आदि वरिष्ठ व्यक्ति के लिए यह श्रेष्ठ स्थान है प्रमुख व्यक्ति का शयनकक्ष इस पद में शुभ है। पूजा स्थान, पढ़ाई का कमरा, धन का कमरा इस पद में बनाया जा सकता है।

दोष के लक्षण –

इसके अशुभ होने पर व्यक्ति कपटी, झूठा, अपमानित होने वाला तथा बिल्ली के समान आचरण करने वाला होता है।  दूरगामी प्रभाव का विचार किए बिना निर्णय लेना समस्या का तात्कालिक हल निकालना समस्या से भागना, सही हल ना करना इस पद के अशुभ होने पर

धन की कमी

क्रोध की अधिकता

मन का विषयों के पीछे भागना

अधर्म का आचरण करना

नियम तोड़ना

सम्मान प्राप्त ना होना

राजकीय विभाग से सहयोग ना मिलना।

 दोष – ऊंचा नीचा होना, गंदगी होना, टूट-फूट होना। नकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होना। शल्य होना। रंग गंध, आंतरिक सज्जा का दोष। रोशनदान का ना होना। दीवार, फ्लोरिंग, दरवाजे, खिड़की, फर्नीचर आदि में दोष होना।

 उपाय – जो दोष हो उसे दूर कर सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित करें। सोने का बना ओंकार न्यास करना चाहिए। खाने वाले फल, उड़द तथा तिल का हवन करें सुगंधित जल का छिड़काव तथा हल्के रंग का प्रयोग करें। विधि विधान से भूमि के अंदर माणक को स्थापित करें। सृजन के लिए लाल व सिंदूरी रंग का प्रयोग करें। भूमि के अंदर कागज व कलम का चिन्ह लगवाएं। सूर्य का रथ (सात घोड़े, एक पहिया, रास ( रस्सियों ) आदि के साथ लगवा सकते है।

विवस्वान

परिचय – अग्नि को ही विवस्वान कहते हैं। जहाँ भी अग्नि है, वह विवस्वान ही है। यह भोजन को पचाता है। मंगल को हम दक्षिण दिशा इसीलिए कहते हैं यही अग्नि, जल के अंदर रहती है जिससे हम जल से विद्युत का उत्पादन कर पाते हैं इसे वडवादिनी कहते हैं। चावल घी व कुम्हड़ा से हवन करना चाहिए इनकी कृपा से यश व बु़ि़द्ध प्राप्त होती हैं। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति ऊर्जावान रहता है वह बुद्धिमान होता है। सूर्य के 12 नाम है इनमें से एक नाम विश्वत है इसे ही विवस्वान कहते हैं इसे अरुण के द्वारा शास्त्र में व्यक्त किया गया है अरुण सूर्य का सारथी है। जीवन में सारथी का सर्वाधिक महत्व है पूरे जीवन की यात्रा किस दिशा में हो रही है उसका मार्गदर्शन तथा उसे आगे ले जाने का कार्य सारथी करता है। सूर्योदय से पहले होने वाले प्रकाश को अरुण कहा है यह यम का पिता है अर्थात काल या समय नियमानुसार जीवन का यापन करना यम है योग शास्त्र में यम व नियम का वर्णन मिलता है सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, यह यम है शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर- प्रणिधान, ये नियम है।

 दोष के लक्षण – उत्साह की कमी, उर्जा का अभाव, तृष्णा, पदार्थ के पीछे भागना, संतुष्ट ना होना, भयभीत रहना, हिंसक होना, अधर्म का आचरण करना, संयम व नियम का पालन ना होना, मार्गदर्शन या जीवन में दिशा का अभाव, जीवन में भटकाव, बार-बार लक्ष्य बदलना, एक कार्य में स्थिर ना रह पाना, स्वास्थ्य, मृत्यु तुल्य कष्ट या बीमारी। स्वामी को कष्ट, साहस का अभाव।

उपयोग – मार्गदर्शन, मैनेजर, सलाहकार, मालिक, प्रमुख व्यक्ति आदि के लिए उचित स्थान है। मैनेजर, कंट्रोलर, दंण्डाधीश, न्यायाधीश, सेनापति, अग्नि संबंधी सारे कायर्, मशीनरी, धर्म-अधर्म का विचार इस स्थान पर किया जाता है।

जिस व्यक्ति को यहां बैठाया जाएगा, वह व्यक्ति के प्रमुख होने की संभावना है। उस व्यक्ति की बात अन्य लोग मानेंगे। जो व्यक्ति सारे कार्य संभालता है जैसे बड़ा पुत्र या कुशल व्यक्ति उसके लिए यह स्थान शुभ है।

क्या ना हो – नकारात्मक ऊर्जा देने वाले पदार्थ नहीं होना चाहिए। नौकर ( चपरासी, ड्राइवर आदि का स्थान न बनवाएँ।) पानी का स्थान ना बनवाएं। यदि पानी से भाप बनवाना हो तो प्रयोग कर सकते हैं।

उपाय – विवस्वत के पद में प्राकृतिक प्रकाश की व्यवस्था हा,े प्रकाश आता हो इसके लिए कक्ष में यथा स्थान खिड़की दरवाजे या रोशनदान की व्यवस्था होनी चाहिए। सूर्योदय के पूर्व के प्रकाश को कमरे में प्राप्त करना चाहिए। व्यक्ति प्रतिदिन सूर्योदय के पूर्व घूमने जाएं। सूर्य नमस्कार करें और सूर्य को जल चढ़ाएं। तिल, मोदन, ओदन, दही का हवन करें। तिल, मोदन, ओदन, दही का भोजन में प्रयोग करें।

मित्र

परिचय – इस पद के सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होने पर व्यक्ति सही सलाह प्राप्त करता है। इस पद के अशुभ होने पर साथी, नौकर, पत्नी, पुत्र, मैनेजर, बैंक आदि सभी का असहयोग मिलता है। इसके ठीक विपरीत यदि इस पद में दोष हो तो व्यक्ति की विवेक शक्ति अवरुद्ध होकर गलत निर्णय करती है व्यक्ति मूर्ख के समान आचरण करता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति को स्त्री का सहयोग प्राप्त होता है वह सुख, यश, धन, सौभाग्य व सफलता को प्राप्त करता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति को सरकारी विभाग, नौकर, पत्नी आदि का सहयोग प्राप्त होता है। इस पद के अशुभ होने पर नकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होने पर व्यक्ति का नौकर, पत्नी आदि से वाद-विवाद या मतभेद रहता है तो कोर्ट कचहरी तक बढ़ने की आशंका रहती है। सरकारी विभाग से कष्ट होता है उसकी सोच नकारात्मक रहती है, किसी भी वस्तु के बारे में नेगेटिव विचार पहले आते हैं। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति धीमी गति से कार्य करने वाला होता है वह दीर्घसूत्री होता है अर्थात 1 दिन का कार्य एक सप्ताह या एक पक्ष या मास में करता है। योजनाएं बनाता है परंतु कार्यान्वित नहीं करता, करता भी है तो बहुत विलंब से करता है इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति उत्साह रहता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति का जीवन नीरस होता है उसमें प्राण शक्ति का अभाव रहता है।

 उपयोग – मुख्य व्यक्ति, प्रमुख व्यक्ति का मुख्य सहयोगी, सहायक, असिस्टेंट, पुत्र आदि के लिए शुभ स्थान है विद्या अध्ययन, शयनकक्ष, सभा, मीटिंग, ड्राइंग, लिविंग का कक्ष बनवा सकते हैं।

 उपाय – पद में गंदगी, टूट-फूट, कटा फटा आदि होने पर उसे दूर रहें। घी व दूध, दूर्वा का हवन करें। शुभ मुहूर्त में पाश व अंकुश को लगवाएं। हल का चिन्हा बनाकर भूमि के अंदर स्थापित करें।

भूधर

भू अर्थात पृथ्वी, धर अर्थात धारण करने वाला, भार उठाने वाला, वहन करने वाला। भूधर अर्थात भूमि को धारण करने वाला, भगवान, अनंत, भगवान विष्णु, भगवान शेषनाग। भूधर का आधार है मूलभूत नींव। किसी भी कार्य को आरंभ करने के उपरांत उसे धारण करके रखना, उसका पोषण करना, उसे ठीक प्रकार से चलाना, उसे नीचे गिरने से बचाना, उसे संभालना, यह कार्य भूधर का पद करता है। जब उधर का पद शुभ होता है, तभी उसके बाहर के पद जैसे भल्लाट, सोम, अदिति आदि शुभ फल देने में समर्थ होते हैं। जिससे पुत्र, पौत्र, धन आदि का सुख व्यक्ति को प्राप्त होता है। यह सुख का स्थान भी कहा गया है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति सुखी होता है। समरांगण सूत्रधार ग्रंथ में इस पद का निघण्टु अनंत अर्थात भगवान शेषनाग ( जिन पर भगवान विष्णु विराजमान होते हैं।) व अपराजिता पृच्छा ग्रंथ में इस पद का निघण्टु भगवान विष्णु दिया है। विष्णु जगत का पालन करते हैं। माया के वशीभूत होने पर ही भोग बनता है। माया के वशीभूत होने पर जीव कार्य में लगता है। फल पाना चाहता है, पुत्र, स्त्री धन आदि का सुख चाहता है। भूधर का पद ही आगे पैशाच विथी में मुख्य भल्लाट, सोम, मृग व अदिति के रूप में परिणित होता है। भल्लाट का निघण्टु चंद्रमा दिया है, चंद्रमा मन का कारक है या मन को प्रदर्शित करता है सोम का अर्थ ही बहुधा चंद्रमा से लेते हैं इसलिए चंद्र वार को सोमवार के नाम से जाना जाता है। भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ कहा है गुरूड़ मन को प्रदर्शित करता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति का मन बलवान होता है उसमें शक्ति रहती है, चित्त एकाग्र रहता है, कार्य में मन लगता ह,ै भटकता नहीं है।

दोष के लक्षण – इस पद में दोष होने पर व्यक्ति का मन वश में नहीं रहता है, वह माया के आधीन रहता है, मन के कहे अनुसार कार्य करता है, व्यसन में लत रहता है, लक्ष्य बार-बार बदलता है, जीवन में भटकाव रहता है, साहस का अभाव रहता है। अधिक दोष होने पर निर्धन तथा अपयश का भागी होता है।

दोष कारण – नकारात्मक ऊर्जा, टूट-फूट, शल्य, गंदगी, शौचालय, अटाला, रोशनदान न होना आदि दोष होते हैं।

उपाय – भूमि के अंदर विधि-विधान से पन्ना लगवाएं। भूमि के अंदर विधि विधान से पास, कमल लगवाएं। खीर का भोजन करें।

खीर का हवन करें।

इस स्थान का प्रयोगानुसार सुनहरे रंग का उपयोग करें।

भगवान विष्णु के चिन्हों को विधि विधान से भूमि के अंदर स्थापित करें ।

आप

हिमवान की पुत्री पार्वती है, जिनका विवाह शिवजी से हुआ। आप पद ही आगे चलकर पैशाच वीथी में दिती के नाम से कहा है। अर्धनारीश्वर की अवस्था को शास्त्र में सामरस्य अवस्था कहा है इस अवस्था में शिव व शक्ति अभेद हैं, उन्हें एक दूसरे से अलग नहीं कर सकते या कह सकते है। यह सृजन के पहले की अवस्था है। इसके बाद ही सारा विकास हुआ यह अभेद अवस्था है। आप व आपवत्स की पद ही आगे पैशाच वीथी में अदिति व दिति के रूप में व्यक्त हुआ है। अदिति व दीदी से ही देव, दानव, नाग आदि सभी की उत्पत्ति हुई है अतः सारे सृजन का केंद्र यहीं से आरंभ होता है। यह मातृशक्ति का प्रमुख स्थान है। इस पद में दोष होने पर मातृशक्ति की कमी हो सकती है। आप, आपवत्स, अदिति व दिति के पद में दोष होने पर मातृशक्ति में प्रजनन संबंधी दोष होने की आशंका रहती है। मातृशक्ति के कारण संतान उत्पन्न होने पर बाधा हो तो इन पदों का दोष दूर कर इस पद सोने का विचार किया जा सकता है। इस पद से कन्या संतान होने की भी संभावना रहती है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति में जीवनी शक्ति की कमी रहती है उसका स्वास्थ्य गड़बड़ रहता है रोग होने की आशंका रहती है औषधि अपना कार्य पूरी तरह से नहीं कर।

 दोष होने पर परिणाम – इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति कार्य करता है परंतु कार्य की दिशा गलत होने से उसका फल उसे पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता है, जिससे उसके अंदर संतुष्टि का अभाव रहता है अतः यह स्थान नेत्र से संबंधित है, इस पद में दोष होने पर नेत्र विकार होता है।

 उपयोग – जल स्थान यहां बनवाना चाहिए। क्योंकि हिमवान का अर्थ जल या बर्फ से है अतः ठंडी वस्तु रखने का स्थान, जल का स्थान जिन कार्यों में ठंडक की आवश्यकता होती है, वह सारे कार्य के लिए शुभ स्थान है। ध्यान के लिए भी यह शुभ स्थान है। औषधि का यह शुभ स्थान है।ं कम महत्वपूर्ण कार्य या सहायक कार्य करने वाले सहायक व्यक्ति के लिए उपयुक्त स्थान है। यहां जो असिस्टेंट आदि हैं, उन्हें बैठाना चाहिए।

 उपाय – दूध व भात का हवन करें।

जल स्थान बनवाएं।

आपवत्स

 उमा – इस अवस्था में मन की किसी भी कामना, वासना या इच्छा से संबंध नहीं होता है। इसे ही हम भावातीत, समाधि, विचार-शून्य निर्विचार की अवस्था कहते हैं। ईश व आपवत्स का पद शुभ होने पर ही सारा सृजन आरंभ होता है। सारा शुभ फल तब ही प्राप्त होता है। ईश का पूरा फल भी अभी प्राप्त हो सकता है। सारे ईशान कोण का मूल यहीं पर है।

दोष परिणाम – इस पद में दोष होने पर विवाह में बाधा उत्पन्न होती है।

उपाय – प्रति सोमवार व्यक्ति हल्दी के जल से स्नान करें।

मूंग व चावल का भोजन करें।

मूंग व चावल का हवन करें।

भूमि के अंदर विधि विधान से अंकुश लगवाएं।

सावित्र

 वेदमाता –

जब ब्रह्मा जी ने संकल्प किया तब ब्रह्मा के मुख से वेद प्रगट हुए। उसके पश्चात ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया। ब्रह्मा जी की जो शक्ति ह,ै जिससे वेद प्रगट हुए वह वेद की जननी वेद माता के नाम से प्रसिद्ध है। उसे सवित्र या सावित्री का नाम दिया।

वेदमाता – जब यह पद शुभ होता है तो व्यक्ति ज्ञानी होता है। यही स्थान विद्या की माता का भी कहा है अर्थात पद शुभ होने पर व्यक्ति विभिन्न विद्या व ज्ञान में पारंगत होता है सत्य के पद में दोष हो तथा सावित्र, सावित्री भी नकारात्मक हो तो व्यक्ति में अधर्म का जन्म होता है वह अधर्म पूर्ण आचरण करता है उसकी बुद्धि दूषित होकर अधर्म को ही धर्म मानने लगती है। इसी प्रकार यह पद संतान उत्पत्ति से भी संबंध रखता है। किसी भी कार्य की उत्पत्ति का संबंध इस पद से है। इस पद के शुभ होने पर कार्य का आरंभ होता है इस पद में दोष होने पर व्यक्ति योजनाएं बनाता है, सब कुछ करता है परंतु कार्य का आरंभ नहीं कर पाता है, उसमें बाधाएं उत्पन्न होती है।

दोष परिणाम – पद में दोष होने पर संतान उत्पत्ति में बाधा होती है। व्यक्ति धर्म का आचरण करता है कार्य का आरंभ होने में रुकावट, धन लाभ में बाधा, अपयश की प्राप्ति।

उपयोग – यह विद्यार्थी के लिए उचित स्थान है। यह पुत्र के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान है। फैक्ट्री में यह फोरमैन, प्लेसमेंट ऑफिसर के लिए उपयुक्त स्थान है। रिसर्च, नई-नई खोज आदि के लिए उपयुक्त स्थान है। स्वयं की प्रतिभा को पहचान कर उसे बाहर निकालता है।

 उपाय – भोजन: खीर व घी

हवन: खीर व घी

पुखराज।

सावित्री

 इसे गंगा के नाम से कहां है इसके अतिरिक्त इन पदों की आपस में समानता है। अतः इनके गुण भी आपस में संबंध रखते हैं। पद शुरू होने पर इसका संबंध शुद्धता से है तथा शुभ होने पर उन्नति व प्रगति को प्रदर्शित करता है। अशुभ होने पर अहंकार, अभिमान व गिरावट से है यह गिरावट आर्थिक आदि भी होती है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति सही तथा तेजी के कार्य करता है इस पद में दोष होने पर  दीर्घ सूत्री होता है, योजनाएं बनाता है परंतु कार्यान्वयन बहुत धीरे धीरे करता है।

हिमवतकी की सबसे बड़ी पुत्री – उमा की बड़ी बहन है उमा अर्थात शिव की शक्ति। ठीक इसी प्रकार कार्य को आरंभ करने में जो सामर्थ्य रखती है, बल लगता है वह यह पद को प्रदर्शित करता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति सामर्थ्यवान होता है, उसमें कार्य को पूरा करने की क्षमता होती है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति की संकल्प शक्ति या कार्य को पूरा करने की संकल्प शक्ति दृढ़ होती है, जीवंटता होती है, जुझारूपन होता है।

धर्म की पत्नी – इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति धर्म या नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए कार्य को आगे बढ़ाता का।

उपयोग – इस पद का उपयोग गर्भधारण करने, किसी कार्य को आरंभ स्तर पर बनाने व क्रियान्वित करने के लिए किया जा सकता है। संस्कार डालने के लिए किया जाता है। ट्रेनिंग के लिए शुभ शान है यह स्थान गाय व नौकर आदि के लिए उचित है।

यह स्थान रिसर्च, सूक्ष्म ऑब्जरवेशन के लिए उचित है।

यह स्थान पुत्र के लिए शुभ है।

उपाय – जल व गुड़ का हवन करें। भोजन में गुड़ का उपयोग करें। कमल, अंकुश, पाश व सिंह का न्यास, भूमि के अंदर रखें।

पुखराज का न्यास करें।

इन्द्र

इन्द्र का निघण्टु हरि दिया है। जिसका अर्थ होता है – रखना, धारण करना, व साथ लेकर चलना। व्यक्ति जो भी क्षमता रखता है, धारण करता है, उसे लेकर चलना उसका उपयोग करना। यह पद व्यक्ति को क्षमतावान बनाता है। इनमें से सबसे अधिक प्रचलित अर्थ जब हम लेते हैं तो वह विष्णु है जिसका अर्थ है पालन करने वाला। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति में पालन करने की क्षमता विकसित होती है। इससे लक्ष्मी या धन की प्राप्ति होती है।

दोष – इस पद में दोष होने पर व्यक्ति अपनी क्षमता को पहचानता नहीं सकता है। यदि पहचानता भी है तो उपयोग नहीं कर पाता। मन पर नियंत्रण ना होना, चित्त समाहित न होना, जिससे समस्या का उचित हल न निकाल पाना, क्रिएटिव आईडिया न आना।

उपयोग – पढ़ाई-शास्त्र का कमरा। स्किल डेवलपमेंट का स्थान।

उपाय – चंपा का फूल, मूंग का हवन करें। मूंग का भोजन करें। भूमि के अंदर पाश, कमल, कल्पवृक्ष, गज व हीरा लगाएं। भूमि के ऊपर जहां देखो वहां कमल, पांश कल्प वृक्ष, गज लगावाएं।

इन्द्रजय-वज्री

वजी्र एक अस्त्र है जो दधीची ऋषि की हड्डियों से बना है। उससे वत्रासुर दैत्य का इंद्र ने संहार किया था। जो अंधकार का नाश करता है, जो समृद्ध बनाता है वह है इंद्र। अर्थात मन अर्थात मन द्वारा इंद्रियों पर नियंत्रण एवं सही दिशा में ले जाना वह कार्य करना, करवाना। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति अपने जीवन में नकारात्मक ऊर्जा, अंधकार, अज्ञान आदि का नाश करता है। ज्ञानवान बनता है तथा मन द्वारा इंद्रियों पर, वासनाओं पर कामनाओं पर नियंत्रण कर सही दिशा में आगे बढ़ता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति समस्या का हल निकालने में सक्षम होता है। इस पद के दोष होने पर व्यक्ति समस्या का हल नहीं निकाल पाता है।

दोष – इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति अपनी इच्छाओं या कामनाओं के वश में होकर आचरण करता है। समस्या का समाधान करने में असमर्थ रहता है।

उपयोग – विद्या कक्ष, स्किल डेवलपमेंट, नई संभावनाओं के जन्म देने का साथ, जन्म का स्थान आदि।

उपाय – चंपा का फूल, मूँग का हवन करें

मूँग का भोजन करें। भूमि के अन्दर पाश, कमल, कल्प वृक्ष, गज, व हीरा लगवाएं।

रूद्र

रूद्र शब्द का अर्थ है रोना, चीखना, चिल्लाना। इस पद के दोष होने पर व्यक्ति अपने अंदर की वेदना, चीख व  चिल्लाकर बाहर निकालता है। उसका स्वभाव उग्र भयानक होता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति का व्यक्तित्व आकर्षक व चमकदार होता है। उसमें शत्रु को पराजित करने की क्षमता होती है। वह रोगों पर भी विजय प्राप्त करने में सक्षम होता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति अपने क्षेत्र में विजय प्राप्त करके प्रमुख स्थान रखता है। रुद्र का अर्थ रोदन या चिल्लाने से लिया, घुटन को बाहर निकालने से लिया है। वह सब कुछ जानता है, समझता है। वह धनवान व समृद्ध होता है। इस पद में दोष होने पर वह कार्यक्षम नहीं होता है, उसकी क्षमताएं घट जाती है। उसकी विवेक शक्ति कमजोर हो जाती है। निर्णय बहुत अधिक सोच विचार कर नहीं ले पाता है। महेश्वरी का अर्थ होता है दुर्गा। महेश्वरी दुर्गा का पति।

उपयोग – प्रमुख सहायक, सहयोगी, सीईओ आदि। मानसर ग्रंथ में लड़कियों के लिए शुभ कहा है।

उपाय – गूगल व कपूर का हवन करें। महानील का भूमि के अंदर न्यास करें। त्रिशूल को भूमि के अंदर लगवाएं। उड़द का भोजन करें।

रूद्र जय

गुह – इस स्थान पर जब व्यक्ति रहता है तो उसमें ऐसा स्वभाविक गुण विकसित हो जाता है जिसे समझना अन्य के लिए मुश्किल होता है। उसका व्यक्तित्व छिपा हुआ होता है।

कीर्तिकेय – इस पद में रहने से व्यक्ति में आक्रामक गुण विकसित होते हैं, वह नेतृत्व के गुण रखता है, अपने कार्य को शीघ्रता से पूरा करता है, धैर्य का अभाव रहता है। जब हम विजय की बात करते हैं तो केवल शत्रु पर विजय की बात ही नहीं है, वरन रोगों पर विजय के बात भी है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति रोग पर विजय प्राप्त करता है। यह स्थान मार्केटिंग, सेल्स प्रोडक्ट लॉन्च करने वाले व्यक्ति के लिए उपयुक्त है। क्योंकि इसके स्वभाव को समझना मुश्किल है, इसलिए यह व्यक्ति अपनी रणनीति तेजी से बदल भी देता है यह स्थान जासूस, कुटिल रणनीतिकार के लिए उपयुक्त है। एसपी कलेक्टर आदि के लिए उपयुक्त है। सामान्य स्थिति में प्रिंसिपल, मैनेजर के लिए भी उचित है।

दोष परिणाम – इस पद में दोष होने पर शत्रु पक्ष या प्रतिद्वंदी बलशाली होता है, उसे हराने में कठिनाई होती है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति रोगी रहता है।

उपाय – भात का हवन व भोजन करें।

ईश

उसके लिए ऋग्वेद में मंत्र मिला की अग्नि को जगा लेने पर मनोकामना पूरी होती है। अग्नि अर्थात शिखी यानी इश का पद अर्थात जब इश का पद सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होता है तो जो मन में इच्छा होगी वह पूरी होती है। दूसरे शब्दों में इश का पद शुभ होने पर व्यक्ति जो भी कामना या इच्छा करेगा वह पूरी होगी। उत्तर पूर्व के कोने में सबसे पहला पद इश का है। यह पैशाच विथी है। सामान्य रूप से प्लॉट में यह स्थान रिक्त रहता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति शासक, सभी कार्य को करने में सक्षम, बलवान तथा ऐश्वर्य से युक्त होता है। वह प्रत्येक कार्य को जो भी उसके पास आता है, उस कार्य को निपटाने में सदैव तत्पर रहता है, उसके कार्य पेंडिंग नहीं रहते हैं। उसके जीवन में एक क्रम होता है वह योजना बनाकर कार्य करता है जिससे वह अपने कार्य में सफलता पाता है वह कार्य की जिम्मेदारी लोगों के साथ बाँटकर कार्य करता है, स्वयं स्वामी बनता है। उसमें नेतृत्व के गुण विकसित होते हैं। दूसरी प्रकार से देखें तो उसे पूर्वाभास होता है वास्तव में पूर्वाभास होना, मन के शांन्त, स्थिर व प्रसन्न होने का गुण है। समरांगण-सूत्रधार ग्रंथ में इसका निघण्टु सर्वभूत भगवान हर दिया है तथा  अपराजित-पृच्छा में इसे शंकर के नाम से बताया है।

शंकर – शंकर शब्द का अर्थ होता है कल्याण करने वाला, समृद्धि व सुख देने वाला अतः इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति सुखी, प्रसन्न व समृद्ध होता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति दुखी रहता है तथा समृद्धि को प्राप्त नहीं कर पाता है।

हर – हर शब्द का अर्थ होता है हरने वाला, दूर करने वाला। इस पद के शुभ होने पर यह दुख को हरने वाला, दुख दूर करने वाला, दरिद्रता आदि को हरने वाला अर्थात समृद्धि देने वाला होता है हर शब्द का अर्थ हरने के साथ-साथ नाश करने वाला है अतः इस पद के शुभ होने पर सभी अशुभ का नाश करता है।

प्रतिमा विज्ञान – त्रिशूल अव्यक्त दंड को प्रदर्शित करता है उसकी तीन फालें सत्व, रज व तम तीन गुणों को व्यक्त करती है।

दोष परिणाम – जब इस पद में दोष हो तो व्यक्ति के कार्य पेंडिंग रहते हैं। वह शारीरिक व मानसिक रूप से आलस्य से युक्त रहता है। जिससे वह समृद्धि को प्राप्त नहीं कर पाता है। कार्य को या रिस्पांसिबिलिटी को डिस्ट्रीब्यूटर नहीं करता है, सोचता है कि मैं ही कार्य ठीक प्रकार से कर पाऊंगा, दूसरे को देने के बाद भी मुझे ही ठीक करना पड़ेगा, इससे अच्छा है कि स्वयं ही कार्य करूं। व्यक्ति का मन एकाग्र नहीं रहता है चित्त अशांत रहता है। कार्य में सफलता या तो देर से मिलती है, अधिक दोष हो तो कार्य में असफल रहता है।

उपयोग – यह पद साफ सुथरा होना आवश्यक है। यह स्थान का उपयोग ड्राइंग रूम, सभा, कार्यस्थल, ऑफिस, जल-स्थान, ध्यान कक्ष, पूजा-स्थल, यज्ञ-स्थल के रूप में कर सकते हैं।

उपाय – सोना, शाली, चांदी का वृषभ, डमरु वह हरिणी भूमि के अंदर लगवाएं। घी व भात का भोजन करें। घी व चावल का हवन करें। स्फटिक भूमि के अंदर लगाएं। स्फटिक का बना हुआ वृषभ, दिखने वाले स्थान पर रखें। शमी वृक्ष की लकड़ी से बनी वस्तुएं। मोर, मोर के पंख

शंकर का फोटो मानसार के प्रतिमा विज्ञान के अनुसार।

पारा।

पर्जन्य

पर्जन्य शब्द का अर्थ – बरसने वाले बादल, विष्णु सहस्त्रनाम में श्री शंकराचार्य जी ने विष्णु जी का एक नाम पर्जन्य कर अर्थ किया है – वरदानों की बरसात करने वाले। जब परजन्य का पद वास्तु अनुसार होगा, शुभ होगा तब व्यक्ति जो संकल्प करेगा, जो कार्य करेगा, जो सोचेगा उसका फल, उसे वरदान के रूप में प्राप्त होगा। शास्त्र में एक वृक्ष का वर्णन आता है जिसे कल्पवृक्ष कहते हैं यह कल्पवृक्ष अपनी इच्छा या संकल्प की पूर्ति करता है। जब कोई संकल्प, मन की गहराई से उठता है तो उसमें पूरा बल होता है, प्रकृति उस संकल्प को पूरा करने में लग जाती है। इस पद के शुभ होने पर हमारा संकल्प पूरा होने में प्रकृति का सहयोग मिलता है तथा व्यक्ति संतुष्ट रहता है। इस पद में वास्तु दोष होने पर हमारे कार्य, हमारे संकल्प, हमारी इच्छाएं पूरी नहीं होती तथा और असंतुष्टि का भाव बना रहता है। इसे पूजा का भाई बताया है अतः यह पद पोषण से संबंधित है। जब यह पद सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित रहता है तो व्यक्ति को प्रकृति का पोषण मिलता है अर्थात कार्य में प्रकृति का सहयोग प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त यह पद निम्न विषयों से संबंधित रहता है विजेता (बलपूर्वक विजय प्राप्त करने वाला ) पूर्वज ( नई परंपरा आरंभ करने वाला, बहुत सी नई खोज करने वाला, निर्माता, गुरु आदि ) स्त्रियों की प्रजनन क्षमता से संबंधित है। औषधियों को पुष्ट करने वाला। बुराइयों व शत्रुओं का नाश करने वाला है। यह पद सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित रहता है तो व्यक्ति की प्लानिंग योजना आदि उचित होती है क्योंकि उसमें पूर्वानुमान का गुण है।

उपयोग – जल स्थान, ध्यान, प्रजनन, शयनकक्ष, ऑफिस, ड्राइंग, सभा, आदि औषधालय (एंटीडोट) आदि निघंटु से चिकित्सक कक्ष।

उपाय – मेघ का चित्र, दारू हल्दी से स्नान, चंदन का छिड़काव, हवन, पर्जन्य (बरसने वाले बादल) सात होते हैं। अगस्त्य पुष्प, अपारजितधूप,  गुड़ के बने पुए व गन्ने का रस, दारू हल्दी इसे कामवती भी कहते हैं। पूषा का पुत्र या छोटा भाई।

जयंत

कश्यप ऋषि का विवाह दक्ष की पुत्रीयों के साथ हुआ, उसी से देव, दैत्य, गंधर्व, यक्ष, सर्प आदि उत्पन्न हुए। जयंत धर्म का पुत्र है। धर्म का पालन करते हुए एवं इंद्रियों को वश में रखते हुए जब व्यक्ति कार्य करता है, तब सफलता प्राप्त होती है। जयंत का निघंटु कश्यप दिया है। कश्यप का एक अर्थ कछुआ होता है। कछुए से हमें यह जानना है कि कछुआ अपने सारे अंगो (इंद्रियों) को एक आवरण के अंदर रखता है। जब किसी कार्य की आवश्यकता होती है तब अंग का प्रयोग करता है अन्यथा आवरण  या खोल के अंदर रहता है। ठीक इसी प्रकार जब हम अपनी ज्ञानेंद्रियों व कर्मेंद्रियों का प्रयोग लक्ष्य की प्राप्ति के लिए करते हैं अन्य कार्यों में दुरुपयोग नहीं करते हैं तब ही हमें सफलता मिलती है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति की विल पावर मजबूत होती है मन शांत, स्थिर, प्रसन्न व उत्साहित रहता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति का मन, उसके वश में रहता है। इंद्रियों व मन को वश में करके लक्ष्य को प्राप्त करता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति धनवान होता है, वह भौतिक सुखों से युक्त होता है। वह भवन, भूमि वाहन, पुत्र-पौत्र आदि का सुख प्राप्त होता है। इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति का चित्त उसके वश में नहीं रहता है। उसके जीवन में भटकाव रहता है। उसके जीवन में धन का अभाव रहता है। उसके जीवन में भौतिक सुखों की कमी रहती है।

उपयोग – इस स्थान का प्रयोग रणनीति बनाना, योजना बनाना आदि के लिए करना चाहिए। मीटिंग रूम, बोर्डरूम, प्लानिंग, प्रिंटआउट लेने, क्रिएटिव कार्य आदि के लिए करना चाहिए। इस स्थान का प्रयोग ड्राइंग रूम, लिविंग रूम आदि के लिए करना चाहिए। पूर्व मुखी प्लॉट होने पर द्वार के लिए यह शुभ पद है, इससे धन की प्राप्ति होती है। ध्यान के लिए शुभ स्थान है। अध्ययन के लिए शुभ स्थान है।

दोष के लक्षण – इस स्थान पर दोष होने पर व्यक्ति का चित्त एकाग्र नहीं होता है, चित्त या मन चंचल जाता है। वह विभिन्न कार्य में भटकता रहता है, एक लक्ष्य का निर्धारण नहीं कर पाता है।  एक कार्य को आरम्भ करने तक उसके पीछे भागता है, उसके आरंभ होने पर उसे चलाने के स्थान पर दूसरे कार्य में लग जाता है। इससे लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाता हैै। हेड ऑफिस ब्रांचओं के बीच में तालमेल ना होना।

उपाय – चंद्रमा छत्र, घी व मक्खन।

भूमि के ऊपर कछुआ रखें। जो लक्ष्य को याद दिलाता रहे। घी व मक्खन का प्रयोग भोजन में करें। घी का हवन करें।

महेंद्र

महेंद्र का अर्थ होता है इंद्र। इंद्र, देवताओं का स्वामी है। इंद्रियों का स्वामी, इन्द्र है। इंद्रियों का स्वामी मन है इसलिए इंद्र को मन कहा है। इंद्र की पत्नी या शक्ति का नाम शची है जो लक्ष्मी को प्रदर्शित या व्यक्त करती है। इंद्र का वाहन हाथी है, यहां हाथी, अर्थ (धन) को व्यक्त करता है। उस हाथी की चार सूँड है जो भाग्य, सलाह, ऐश्वर्य व उत्साह को बताती है। अर्थात जब महेंद्र का पद शुभ हो, वास्तु के अनुरूप हो व्यक्ति भाग्यवान होता है, उसे उचित सलाह मिलती है तथा वह स्वयं भी उचित सलाहकार होता है। वह अच्छा परामर्शदाता या अच्छा कंसलटेंट बनता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति, दूसरे पर शासन करने वाला होता है। अपने अधीनस्थ गति पर नियंत्रण रखने वाला एवं धनवान होता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति का भाग्य साथ नहीं दे पाता, गलत सलाह के अनुसार कार्य करता है तथा नीर-उत्साहित रहता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति अपने अधीनस्थ व्यक्तियों पर नियंत्रण नहीं रख पाता है, उसके नौकर उसका कहना ना मानकर, मनमाना व्यवहार करते हैं। सरकारी विभाग से असहयोग या दंड मिलता है।

उपयोग – यह पद द्वार के लिए शुभ है। इस स्थान का उपयोग ड्रॉइंग रूम, लिविंग रूम, सभाकक्ष, प्रशासन, ऑफिस, मुख्य केबिन आदि के रूप में कर सकते हैं। यह स्थान अन्य स्थिति में दास या नौकर के लिए भी कहा है।

उपाय – भूमि के अंदर वज्र, कमल लगवाएं। ऑफिस हो तो भूमि के ऊपर वज्र का चिह्न रखें। प्रशासन के अतिरिक्त कार्य में कमल का चिन्ह रखें। चमेली और मोगरा पुष्प व पंजीरी का हवन करें। भोजन में पंजीरी का उपयोग करें।

सूर्य

 परिचय – इस पद के  शुभ होने पर व्यक्ति तेजवान होता है वह आभा से युक्त होता है। प्रभा का अर्थ होता है आभा, तेज, ताप व रोशनी। अतः इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति, किसी भी विषय को उसके सभी पक्षों या पहलुओं से प्रकाशित करने में समर्थ होता है। वह प्रत्येक विषय को उसकी गहराई, उसके रहस्य के सहित जानता है। सूर्य का पद शुभ होने पर व्यक्ति में नकारात्मक विचार नहीं आते हैं, उसकी इंद्रियां, मन व बुद्धि में शुचिता या पवित्रता होती है। उसका व्यक्तित्व चमकदार होता है, वह यशस्वी होता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति भौतिक व आध्यात्मिक जगत में उत्तरोत्तर प्रगति करता है, ऊपर उठता है। वह दूसरों के लिए भी एक आदर्श या प्रेरक का कार्य करता है। इनसे यम व शनि की उत्पत्ति बताई गई है। यम व शनि, नियम के पालन कर्ता के रूप में जाने जाते हैं। यह धर्मशास्त्र व समृति ग्रंथों के रचयिता हैं। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति शक्तिशाली, स्वस्थ, हर परिस्थिति का सामना करने में समर्थ होता है, इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति विजयी, इंद्रियों व मन पर नियंत्रण रखने वाला,  सत्यवचन बोलने वाला तथा स्वभाव से क्रोधी होता है।

दोष होने के लक्षण – इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति विषय की गहराई नहीं समझ पाता है, त्वरित व गलत निर्णय लेता है, इससे जीवन में कठिनाई पाता है। उसके अधिनस्थ व्यक्ति, उसकी बात नहीं सुनते व नहीं मानते हैं। इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति उत्साहहीन, आलसी, अक्रिय, झूठ बोलने वाला, डरपोक, निर्णय न लेने वाला या गलत निर्णय लेने वाला होता है।

उपयोग – यह स्थान मैनेजर, कंट्रोलर, प्रशासनिक कार्य के लिए उपर्युक्त है। पूर्व मुखी घर होने पर इस स्थान पर ड्राइंग रूम, लिविंग रूम आदि के लिए शुभ है। स्वामी के वास के लिए उचित स्थान है। नीति निर्धारक के लिए शुभ पद है। तिजोरी रखने के लिए उचित स्थान है। स्थान ग्रह के लिए शुभ है। अध्ययन कक्ष, वेद पाठ, यज्ञ, ध्यान, मनन-चिंतन, विचार-विमर्श, मीटिंग रूम, कॉन्फ्रेंस रूम, के लिए शुभ है। लोगों या स्टाफ को मोटिवेशन टाॅक, प्रवचन देने के लिए शुभ स्थान है।

क्या नहीं होना चाहिए – टॉयलेट नहीं बनवाना चाहिए। नकारात्मक ऊर्जा देने वाले पदार्थ जैसे राख, कोयला, भूसी, लोहा, अटाला आदि इस स्थान पर नहीं रखना चाहिए। अंधेरा नहीं होना चाहिए। (प्राकृतिक प्रकाश वह हवा आना चाहिए।)

उपाय – रविवार का उपवास करें। सूर्य देव को प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व स्नान कर जल चढ़ाएं। सूर्य नमस्कार करें। सूर्य से संबंधित वस्तुओं का दान, स्नान, भोजन आदि करें। भगवान को लाल फूल चढ़ाएं। कुमकुम आदि का प्रयोग करें या चलाएं या पानी में डालकर स्नान करें। सोने या तांबे के पात्र में रात्रि में जल भरकर रखें। अगले दिन उस जल को पीएँ, उस जल से स्नान करें। मसूर की दाल का भोजन में प्रयोग करें। शहद व मालपुआ का भोजन रविवार को करें। शहद व मालपुआ से हवन करें। सोने से बना स्वस्तिक, एरावत, अंकुश, वज्र के चिन्हा बनवाकर भूमि के अंदर स्थापित करें। शुभ मुहूर्त में भूमि के अंदर माणिक्य लगवाएं।

आदित्य के रूप निर्माण का विधान – सूर्य देव को एक पहिए तथा सात घोड़े से युक्त, 6 रेखाओं से चिन्हित उत्तम रथ पर बैठा हुआ निर्मित करना चाहिए।

सत्य (धर्म)

समरांगण – सूत्रधार में निघंट में सत्य का अर्थ, धर्म दिया है। ऐसे व्यक्ति, परामर्श का कार्य कर सकते हैं। वास्तु में सत्य का पद जब सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित है अर्थात शुभ होता है तब व्यक्ति में यह गुण घटित होता है। धर्म का पुत्र व्यवसाय को कहा है। जब व्यक्ति, धर्म पर खड़ा होकर व्यवसाय में प्रवृत्त होता है। तब उसमें बहुत बड़ा बल होता है और वह सफलता पाता है। समरांगण-सूत्रधार में कुबेर के पास का पद का नाम व्यवसाय दिया है। धर्म का पालन करने पर व्यक्ति, व्यवसाय व सुख का लाभ प्राप्त करता है। इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति अधर्म को धर्म मानकर, अधर्म का आचरण करने लगता है। उसकी बुद्धि आच्छादित हो जाती है, उसकी विवेक शक्ति कार्य नहीं कर पाती अतः वह विपरीत निर्णय को ही सही मानती है। वृषभ को धर्म कहां है यह शिव जी का वाहन है, नंदी को धर्म कहा। इसी प्रकार सूर्य की ध्वजा सिंह है, उसे धर्म कहा। तात्पर्य क्या है, तात्पर्य यह है जो आपका वाहन है, जिस पर आप बैठकर यात्रा करते हैं, चलते हैं अर्थात आपका आचरण जिस पर खड़े हैं वह आपका वाहन है वह धर्म पर आधारित होना चाहिए।ं ध्वजा से अर्थ है जो आपका लक्ष्य है वह धर्म पर ही आधारित होना चाहिए।

धर्म का प्रतिमा विज्ञान इस प्रकार है – धर्म के चार मुख, चार पैर तथा चार भुजाएं निर्मित करना चाहिए। उन्हें सब आभूषणों से विभूषित, सफेद वस्त्र से आवृत तथा गौर  वर्ण का बनवाना चाहिए। उनके दाहिने हाथ में अक्ष माला तथा बाएं में पुस्तक तथा दाहिने भाग में मूर्तिमान व्यवसाय करें। बाएं भाग में अत्यंत रूपवान सुख किया जाना चाहिए।

व्याख्या – सत्य के पद के शुभ होने पर व्यक्ति समय का सदुपयोग करता है अर्थात इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति शास्त्रीय या नियम के बताए अनुसार कार्य करता है। व्यक्ति धर्म का आचरण करता है तो कीर्ति आदि को प्राप्त करता है।

दोष के लक्षण – अधर्म को धर्म मान कर कार्य करना। कार्य करने पर भी कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, मति, बुद्धि, लज्जा, वपु, शांति, सिद्धि और सृष्टि की प्राप्ति न होना।

उपयोग – नीति-निर्धारण, न्यायालय, न्यायाधीश, सलाहकार, परामर्श के कक्ष, मीटिंग, ड्राइंग, शयन कक्ष के रूप में करना चाहिए। शास्त्र अध्ययन के लिए शुभ स्थान है। लीगल-एडवाइजर के लिए उचित स्थान है।

क्या ना हो – शौचालय, टूट-फूट, गंदगी, कटा-फटा आदि ना हो।

उपाय – नंदी का चिह्न, भूमि के ऊपर स्थापित करें। घी व गेहूं के आटे, शहद का प्रयोग भोजन में करें। घी व गेहूं के आटे, शहद का प्रयोग हवन में करें। अक्षमाला व पुस्तक का चिन्ह भूमि के अंदर रखें। सफेद रंग का प्रयोग करें।

भृशः (मन्मथ)

परिचय – यह स्थान मन्मथ अर्थात कामदेव का कहा है। कामना से हम इसे जोड़ सकते हैं। भृश शब्द का अर्थ है प्रचुरता, अधिकता, तीव्रता, शक्तिशाली, बगैर झिझक के, बहुधा आदि। इसका संबंध कामना से है, इच्छा है, इच्छा शक्ति से है। इन सब गुणों को जब हम एक साथ देखें तो शब्द बनता है जुनून। इसे ही अंग्रेजी में दृढ़ता कहते हैं इसमें व्यक्ति के क्रूर बनने की भी आशंका रहती है, कार्य में विघ्न पड़ने पर व्यक्ति क्रूरता का व्यवहार कर सकता है। समरांगण-सूत्रधार तथा अपराजित-पृच्छा में भृश पद का निघंटु कामदेव व मन्मथ दिया है। कामदेव-प्रेम का देवता भी है। जिस विषय पर आपको मंथन करना हो, जिस विषय पर चिंतन करके किसी निष्कर्ष पर पहुंचना हो, उस विषय का विचार इस स्थान पर बैठकर करना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहेंगे कि भृश का पद शुभ होने पर व्यक्ति उचित प्रकार से विषय का विश्लेषण कर सही निष्कर्ष पर पहुंच सकता है। उसकी विश्लेषण करने की क्षमता सही कार्य करती है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति विषय का सही प्रकार से विश्लेषण नहीं कर पाता है तथा गलत निष्कर्ष निकाल लेता है। यह स्थान सूक्ष्म विश्लेषण, रिसर्च, फाल्ट डिटेक्ट करना, किसी यंत्र (कार, मशीन, मिक्सर, कंप्यूटर आदि) या खाता (अकाउंट) आदि में निरीक्षण करने (जैसे वह परेड हो कार्य हो प्रोडक्ट हो या व्यक्तियों) के लिए शुभ हैं। यह पद व्यक्ति की कामना, वासना, इच्छा को प्रदर्शित करता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति की कामना सकारात्मक होती है। कामदेव का वाहन शुक्र या तोता कहा है। आगम ग्रंथ में तोता ज्ञान को प्रदर्शित करता है। कामदेव को ध्वजा में मकर का चिन्ह कहा गया है। मकर वीर्य को प्रदर्शित करता है। वीर्य का अर्थ साहस होता है। कामदेव की 4 पत्नियां इस प्रकार बताई गई है – रति, प्रीति, शक्ति तथा उज्जवल मदरशक्ति अर्थात इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति रति (राग, कार्य में लगा कार्य में आ सकती), प्रीति (कार्य से प्रेम), शक्ति (कार्य करने में लगने वाला बल), मदशक्ति (मैं भली प्रकार कार्य करने में सक्षम हूँ, ऐसा मानने का जो मद है उस शक्ति के साथ) युक्त होता है इस पद में दोष होने पर आपके अपने लक्ष्य या उद्देश्य के अतिरिक्त अन्य विषय के राग, प्रीति आदि से युक्त होगा।

दोष के लक्षण – उत्साह की कमी, कार्य में अरूचि, लक्ष्य के अतिरिक्त विषयों में रूचि, समय का दुरुपयोग, ऊर्जा का क्षय या नाश या दुरूपयोग, फालतू समय बिताना।

उपयोग – इस पद का उपयोग मनन, चिंतन, प्लानिंग, निरीक्षण, गुण-दोष का पता लगाने के लिए किया जाता है। इसमें मीटिंग रूम, डिशक्सन, एकांउट, फाल्ट-डिटेक्ट (कम्प्यूटर सुधारना, मशीन सुधारना) आदि के लिए करना चाहिए।

उपाय – दोष ( नकारात्मक ऊर्जा) को दूर करें। भोजन में मक्खन व नारियल का प्रयोग करें। नारियल का तेल प्रयोग में लाएं, उससे बना भोजन करें। हवन में मक्खन व नारियल का प्रयोग करें। मकर का चिन्ह बनवाकर भूमि के अंदर स्थापित करें। तोते का चित्र भूमि के ऊपर लगवाएं। कमर पर रखे हुए बाएं हाथ से निद्रा का बोध कराना चाहिए तथा दाहिने बगल में संकर्षण हो। भाई और वासुदेव, एकादश स्र्द्र और स्वामी कार्तिकेय का निर्माण करना चाहिए।

अंतरिक्ष (नभ)

अंतरिक्ष अर्थात आकाश, अर्थात अवकाश, अर्थात खाली स्थान। सारा भौतिक जगत आकाश से ही उत्पन्न हुआ, उसी में विलीन हो जाता है। सारा सृजन रिक्त या खाली स्थान से ही आरंभ होता है। जिस प्रकार बीच के मध्य जो रिक्त या खाली स्थान होता है, वही से बीज का सृर्जन आरंभ होता है। ठीक उसी प्रकार हमारे सारे विचार का मूल स़्त्रोत मुझे या खाली स्थान है। इस अवस्था के प्राप्त करने पर हम किसी भी समस्या या प्रश्न का उचित समाधान पा सकते हैं। इस पद के शुभ होने पर हम अवकाश या समय निकाल पाते हैं तथा अपने कार्य नीति का विश्लेषण कर पाते हैं। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति असीमित विस्तार को प्राप्त करता है। उसके कार्य का विस्तार बहुत अधिक होता है। इस पद में दोष होने पर विस्तार में बाधा होती है, योजनाएं नहीं बनाता, विस्तार की इच्छा नहीं करता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति की प्रतिभा मेधावी होगी, परंतु वह गलत दिशा में कार्य करेगा। जहां सिंिहका का पुत्र होने से राहु का भाई है, इसलिए राक्षस है, शक्ति संपन्न है, प्रतिभा है परंतु दुरुपयोग में लगी है। यह पद सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होने पर व्यक्ति प्रतिभावान भी होगा तथा प्रतिभा का सदुपयोग भी करेगा।

उपयोग – इस कक्ष का उपयोग शयन कक्ष के रूप में कर सकते हैं। इस पद का प्रयोग ड्राइंग रूम के रूप में कर सकते हैं। मंथन, चिंतन, विश्लेषण के लिए शुभ स्थान है। रसोई के लिए शुभ है।

उपाय – उड़द व हल्दी गुड़ का प्रयोग पूजन में करें।

मारुत,(स सू वायुदेव ), अग्नि(तेज समुदभव)

निघंटु वायु – निघंटु वायु के अशुभ होने पर व्यक्ति थका हुआ रहता है। तेज रहित रहता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति लालची होता है, उसकी कामना या इच्छा बढ़ती ही जाती है, उसमें संतुष्टि का पूर्ण रूप से अभाव रहता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति तेज, कुशाग्र बुद्धि वाला व विद्वान होता है। वह ऊर्जा से भरा रहता है।

अग्नि देव की मूर्ति के निर्माण का विधान

अग्नि देव की चार भुजाएं तथा चार दाढ से एवं चार तोतों से युक्त बनवाना चाहिए। ज्वाला के रूप में वस्तुओ को ग्रहण करते सब देवताओं को उनका-उनका भाग पहुंचता है। वाग्दंड, धिग्दंड तथा वधदंड उनके चार दाढ़ कहे गए हैं।

वाग्दंड – इस पद में दोष होने पर व्यक्ति निंदा करने वाला होता है। वाणी से अपराध (गाली-गलौज) करने वाला होता है।

धिग्दंड – धिक्कारना, निंदा करना।

धनदंड – जुर्माना

वधदंड – मृत्युदंड

इस पद में दोष होने पर व्यक्ति को चार प्रकार के दंड प्राप्त हो सकते हैं अपमान, धिक्कार, जुर्माना या मृत्यु दंड।

पूषा-पूषण (मातृगण)

 पूष शब्द का अर्थ पोषण करना है। यह स्थान शुभ होने पर सभी का उचित पोषण होता है, जिस क्षेत्र को बढ़ाना चाहते हैं वास्तु उसमें अपना पूरा सहयोग देता है। इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति के कार्य पूर्ण नहीं होते, उसमें रुकावट आती रहती है, रुक-रुक कर कार्य आगे बढ़ता है। जब वास्तु में पूषा का पद शुभ होता है तो व्यक्ति को अपने कार्यों में पूरा पोषण प्राप्त होता है। माताएं, प्रकृति की विभिन्न शक्तियां है, ये कहीं 7, कहीं 8, कहीं 16 कहीं कई है।

चामुण्डा – पूषा का पद शुभ होने पर इन सभी मातृकाओं का सहयोग प्राप्त होता है। मातृ शब्द का अर्थ पैमाना, जानने वाला लक्ष्मी। इसके आधार पर जब हम विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति प्रत्येक कार्य के लिए आवश्यक ऊर्जा ही लगाता है, दूसरे शब्दों में अपव्यय नहीं करता है, जितनी उर्जा लगाता है उसका पूरा-पूरा उपयोग करता है या उसका पूरा आउटपुट लेता है। इस पद के शुभ होने पर लक्ष्मी का फल अर्थात धन प्राप्त होता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति को संबंधित विषय का पूरा ज्ञान प्राप्त होता है। पशु वृद्धि, अन्न में रहकर प्रजाजनों की पुष्टि, संतोष लेने वाले, इन्द्रजाल क्रिया के मुख्य देवता, चीनी व अनार से संतुष्ट। अग्नि का रूप धर्मप्रद एवं नित्य कहा है जिसके लिए संसार में वेद प्रवृत्त हुए और जो सब देवताओं व राक्षसों का मुख है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति अपने धर्म का पालन करता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति सफलता या सिद्धि को प्राप्त करता है। इस पद का संबंध अग्नि से है। निघंटू में अग्नि का अर्थ दिया है आगे रहने वाला, प्रेरणादाई, दूसरों के लिए आदर्श, कार्य करने वाला, संपतिदाता या धनदाता। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति धन, ऐश्वर्य, आनंद, यश, कीर्ति, भौतिक सुखों से युक्त रहता हैै।

दोष – इस पद में दोष होने पर व्यक्ति अपयश, दुखी तथा भौतिक सुखों से वंचित रहता है। प्राण शक्ति का अभाव रहता है। थका हुआ रहता है।

उपयोग – अग्नि संबंधी कार्य जैसे रसोई, बॉयलर आदि सुनार, लोहार, संबंधी कार्य आदि। निरीक्षण, परीक्षण, रिसर्च, इन्वेस्टिगेशन, जांच, लेबोरेटरी, डाक्टर (रोग का पता लगाना) आदि। जिस वस्तु को परिष्कृत करना हो, रिफाइनरी आदि। बारीकी से काम करना जैसे अकाउंट आदि। अग्नि कोण को यम कहते हैं, मंगल को मूंगा व त्रिकोण को आग्नेय कोण में प्रयोग करते हैं।

उपाय – भोजन में दूध व घी का प्रयोग करें। तगर की धूप दे। भूमि के अंदर लोहे का मेष लगवाएं, तांबे का बना हुआ स्त्रक भूमि के अंदर रखें।

दोष – इस पद में दोष होने पर व्यक्ति को सहयोग प्राप्त नहीं होता तथा उसे अकेलापन महसूस होता है। इसे लक्ष्मी का स्थान भी कहा है, इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति को लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। अशुभ होने पर लक्ष्मी का नाश होता है।

उपयोग – शयनकक्ष, गाय का स्थान, नौकर का स्थान, धन का स्थान, माता का स्थान, सहयोगी, मुख्य सहयोगी, अकाउंट्स, आदि

उपाय – सेम की फली तथा दूध, खीर का प्रयोग भोजन में करें। सेम की फली, दूध, खीर से हवन करें। घर में कपूर की धूप दे। गाय सहित बछड़ा की प्रतिमा लगाएं। चीनी व अनार से संतुष्ट।

वितथः  अधर्म कलियुग का पुत्र (स सु)

वितथ का अर्थ किया अधम, जूठा, असत्य, कलयुग का पुत्र, माया। इसके आधार पर जब हम वितथ को देखने का प्रयास करते है तो पाते है कि जिसका वास्तविक रूप ढका हुआ हो, तो जैसा है वैसा न होकर उसका दूसरा या विपरीत रूप दिखाई देता है। इस पद के नकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होने पर व्यक्ति माया या अधर्म के अधीन होकर कार्य करता है। वह दिखावे में ही विश्वास रखता है। वास्तविकता से दूर भागता है। धीरे-धीरे उसका स्वभाव दिखावे का बन जाता है और वह झूठ बोलता है। पूर्व दिशा में सत्य के पद में भी दोष हो तो व्यक्ति अधर्म को ही अपना धर्म मान कर सारा कार्य करता है। इस पद में द्वार होने का परिणाम बताया है कि व्यक्ति दास होता है। उसका व्यवहार, नौकर या दास के समान होता है तात्पर्य यह है कि व्यक्ति मन का, इंद्रियों का दास या गुलाम होता है। व्यक्ति मन के वशीभूत होकर कार्य करता है, सही-गलत में फर्क नहीं कर पाता है तथा इंद्रियों के अधीन होकर कार्य करता है। इस पद में द्वार हो तो व्यक्ति स्वयं निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता है, यदि किसी निष्कर्ष पर पहुंचता भी है तो दूसरे से सहमति लेकर ही अपने निर्णय को सही मानता है।

दोष के लक्षण – व्यक्ति अधर्म का आचरण करें। व्यक्ति का स्वभाव झूठ पर आधारित हो। वह दिखावे में अत्यधिक खर्च करता हो। आय से अधिक व्यय हो। अनावश्यक व्यय हो।

उपयोग – दास, नौकर, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के निवास या बैठने के लिए शुभ है। रंगमंच, नाटक के लिए उचित है। भोजनशाला बनवाना चाहिए। यह स्थान नमक, मसाले आदि के लिए शुभ है।

क्या ना हो – स्वामी का स्थान ना हो। मुख्य द्वार ना हो।

उपाय – जो भी दोष हो। उसे दूर करें। वह स्थान स्वच्छ हो। भूमि के ऊपर गाय सहित बछड़ा की मूर्ति रखें। भोजन में चने व भात का प्रयोग करें। चने वह भात का हवन करें।

गृहक्षतः  बुध

गृहक्षतः शब्द का अर्थ अ डिवाइन बीइंग है इसका अर्थ हम शुभ आत्मा ले सकते हैं। समरांगण-सूत्रधार में ग्रहक्षत का निघंटु दिया है-बुध। बुध का अर्थ होता है -जागरूक, सतर्क, चैकन्ना। बुद्धिमान, चतुर, सोम या चंद्र का पुत्र। बुध का पुत्र- पुरुरवस पुरुरवस का पुत्र आयुष। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति अपने आप में जगा रहता है। वह विषय या इंद्रियां या मन में स्थित न रहकर स्वयं में स्थित रहता है। बुध का दूसरा अर्थ- बुद्धिमान, चतुर, विद्वान, शिक्षक। इसका तात्पर्य यह है कि इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति बुद्धिमान होगा, वह अपने विषय का विशेषज्ञ होगा तथा शिक्षण आदि का कार्य करने में सक्षम होगा। बुध को चंद्रमा या सोम का पुत्र कहा है। चंद्रमा मन को प्रदर्शित करता है तात्पर्य यह है कि बुध का शुभ फल तब घटित होगा, जब व्यक्ति का मन पर पूरा नियंत्रण होगा। मन, व्यक्ति के वश में होगा। बुध का पुत्र है पुरुरवस। पुरुरवस का पुत्र है आयुष। आयुष का अर्थ है जीवन, वीर्य, बल, साहस, स्वास्थ्य, आयु, क्षमता। अर्थात गृहक्षतः का पद शुभ होने पर व्यक्ति दीर्घायु होता है, वह स्वस्थ होता है किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने की उसमें क्षमता होती है।

दोष व परिणाम – इस पद में दोष होने पर व्यक्ति की विवेक शक्ति कमजोर होती है। वह सही निर्णय नहीं ले पाता है।

उपयोग – दक्षिण मुख का प्लॉट होने पर द्वार के लिए एकमात्र शुभ स्थान है। अन्य दिशा का मुख होने पर शयन कक्ष के लिए उचित स्थान है। धर्मशाला, वाहन के लिए शुभ स्थान है। यदि ऑफिस है तो मुख्य व्यक्ति के बैठने के लिए शुभ स्थान है।

उपाय – यदि कक्ष का प्रयोग प्रशासन हेतु कार्य में किया जाता हो तो सिंह का चिन्ह बनवा कर भूमि के अंदर स्थापित करें। (ध्यान देने योग्य है कि बुध का वाहन यहां से बताया है, दक्षिण दिशा की आय भी सिंह आय है, दक्षिण दिशा प्रशासन की दिशा बताई है।) जटामांसी के तेल का प्रयोग सिर में लगाने के लिए करें। भोजन में शहद व भात का प्रयोग करें। शहद व भात से हवन करें।

यम

नियमानुसार जीवन का यापन करना यम है। योगशास्त्र में यम व नियम का वर्णन मिलता है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह ये यम हैं। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान, ये नियम है। जब यम का पद शुभ होगा तब व्यक्ति यम का पालन करेगा। वह मन से, वाणी व कर्म से अहिंसक होगा।आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह नहीं करेगा। आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह ही तृष्णा कहलाती है। इसके विपरीत जब यम के पद में दोष होगा तो व्यक्ति असत्य वचन बोलने वाला होगा, हिंसक होगा, तृष्णा के पीछे भागने वाला होगा, असंतुष्ट होगा। प्रतिमा विज्ञान के अनुसार यम के साथ उनकी पत्नी धुर्मोणा है। उनके साथ चित्रगुप्त है, चित्रगुप्त के हाथ में कलम व पत्र है। उनका वाहन भैंसा है। उनके दाहिने हाथों में दंड व खंग होना चाहिए। उनका वाहन भैंसा, मोह को प्रदर्शित करता है। व्यक्ति का मोह ही मरण का एक रूप है। यम का पद शुभ होने पर व्यक्ति मोह के वश में नहीं रहता। सदैव जागरूक या अलर्ट या दृष्टा भाव में स्थित रहकर कार्य करता है। चित्रगुप्त के माध्यम से आत्मा को बताया है। मनुष्य जो भी कर्म करता है, चित्त पर उसका लेखन होता रहता है, अच्छे और बुरे दोनों कर्मों का लेखा जोखा रहता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति तटस्थ रूप से निर्णय नहीं ले पाता है, वह लोभ या मोह के वशीभूत होकर गलत निर्णय करता है, जिससे पूरा उचित परिणाम प्राप्त नहीं होता है, लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती है इस पद में दोष होने पर व्यक्ति, संग्रह बहुत अधिक करता है। आज के समय में कलयुग के इस काल में हमारी बुद्धि इतनी दूषित हो गई है कि वह इसे शुभ मानने लगी है। परंतु ऐसा व्यक्ति पद में दोष होने पर कई मकानों का स्वामी होगा, धन का बहुत अधिक संग्रह करेगा। दान आदि में विश्वास नहीं रखेगा। संग्रह का सदुपयोग नहीं करेगा।

उपयोग – प्रशासनिक कार्य के लिए, प्रशासनिक अधिकारी, मैनेजर, डायरेक्टर, प्रिंसिपल, मालिक, स्वामी के लिए यह उचित स्थान है। शयन कक्ष के लिए शुभ पद है। भोजन कक्ष के लिए यह स्थान शुभ है।

उपाय – भूमि के अंदर महिष (भैंसा), पाश, त्रिशूल, दंड, खंग, ढाल के चिन्ह लगवाएं। लोहे का वृषभ भूमि के अंदर स्थापित करें। रांगा का उपयोग इस पद में करें। सेम की फली व भात का प्रयोग भोजन में करें।

गंधर्वः-नारद (प्रतिमा विज्ञान)

नारद ब्रह्मा जी के पुत्र। गंधवर्, देवताओं के लिए नृत्य आदि करने वाले होते हैं। संगीत, नृत्य से संबंध रखते हैं। इस स्थान का उपयोग मनोरंजन आदि के साधन के रूप में किया जाता है। यह स्थान शयनकक्ष के लिए उपयुक्त है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति एहसान मानने वाला होता है। यह स्थान चिकित्सक के लिए भी शुभ है सेनापति के लिए शुभ है अतः इस पद का उपयोग मैनेजर, लीडर, मार्केटिंग आदि के लिए कर सकते हैं। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति नृत्य, संगीत आदि में रुचि रखकर व्यसनी हो जाता है। यह पद में दोष होने पर व्यक्ति एहसान न मानने वाला होता है।

भृंगराजः- राक्षस, नैर्ऋति का पुत्र

भृंगराज पद के अशुभ होने पर भाग्य साथ नहीं देता। भाग्य साथ नहीं देता का तात्पर्य है प्रारब्ध या पूर्व कर्म का फल प्रकट या प्राप्त नहीं होता, उसमें बाधा आना, तो इस पद में दोष होने पर व्यक्ति को उसके कार्य का फल प्राप्त नहीं होता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति को मृत्यु तुल्य कष्ट प्राप्त होता है। निर्ऋति को अधर्म की पत्नी, भय व नरक की माता तथा हिंसा की पुत्री कहा है। भृंगराज निर्ऋति का पुत्र है। जब इस पद के साथ-साथ सत्य व वितथ के पद में दोष होता है तो व्यक्ति का आचरण-व्यवहार और अधर्म पर आधारित होता है, वह क्रोध व हिंसा से युक्त रहता है, परिणाम स्वरूप भय से ग्रसित रहता है तथा उसका जीवन नारकीय होता है। निऋति का पुत्र से तात्पर्य ले सकते हैं मोह का पुत्र या मोह का परिणाम। तो मुंह का परिणाम दुख ही होता है। मोह के कारण ही व्यक्ति सही निर्णय नहीं ले पाता है, परिणामस्वरूप दुख को प्राप्त होता है। भृंगराज का पद शुभ होने पर वह सौभाग्य से युक्त होता है, भाग्य उसका साथ देता है, कार्य करने पर उसका शुभ परिणाम प्राप्त होता है। इसलिए हम इसे भाग्य स्थान के रूप में देख सकते हैं।

उपयोग – शयन का स्थान। धान्यालय(रसोई के सामान का स्थान), आभूषण रखने का स्थान।

मेष (मृग) अनंत स्वयंभू व धर्म

सबसे पहले मृग शब्द के माध्यम से मृग के गुणों को देखने का प्रयास करते हैं। किसी चीज का ज्ञान प्राप्त करना, खोजना, किसी वस्तु के पीछे लगना, रिसर्च खोज आदि। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति में खोज की प्रवृत्ति होती है। वह किसी बात को अंत तक जानना चाहता है। जिज्ञासु प्रवृत्ति का होता है। दोष होने पर खोज की प्रवृत्ति नहीं होती, विष्णु पुराण में मृग को चंद्रमा का घोड़ा बताया है। चंद्रमा अर्थात मन, मन जिस पर बैठकर यात्रा करता है, वह है मन का वाहन अर्थात घोड़ा। मन की गति को वश में करने में संगीत एक सशक्त माध्यम हो सकता है। मृग का अर्थ हम कस्तूरी मृग से भी ले सकते हैं। कस्तूरी मृग के अंदर ही उसकी नाभि में रहती है। उसमें से बहुत ही मधुर गंध निकलती रहती है। मृग को मालूम नही होता की कस्तूरी उसके अंदर ही है तथा वह कस्तूरी की तलाश या खोज में इधर-उधर भटकता रहता है । इसी प्रकार इस पद में दोष होने पर व्यक्ति अपनी स्वयं की प्रतिभा से अपरिचित रहता है।

स्वयंभू – मृग का पद शुभ होने पर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का निर्माण स्वयं करता है। वह स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम होता है।

धर्म – दोष होने पर प्रत्येक कार्य सीखना पड़ता है। आगे बढ़ने या सीखने की प्रवृत्ति नहीं होती है।

उपयोग -यह स्थान मुख्य व्यक्ति के लिए उपयुक्त है। इस पद से सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होने पर इसका उपयोग शयन, ऑफिस में प्रमुख व्यक्ति के बैठने के स्थान के लिए किया जा सकता है। प्लानिंग, प्रचार-प्रसार, प्रतिभा के उपयोग के लिए उपयुक्त स्थान है। भात व दही का भोजन करें। ब्रह्मा व धर्म से संबंधित चिह्न लगवाएं।

पितृ-पितृलोक, विश्वदेव

विश्वदेव-देवता – इस पद का संबंध पितृलोक से है, पूर्वज से है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति को अपनी पूरी परंपरा का लाभ प्राप्त होता है। इसे हम पूर्व में अर्जित गुडविल भी कह सकते है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति को अपने सीनियर का ज्ञान उपलब्ध होता है, वह गुरु, शास्त्र, पूर्वज, माता-पिता की आज्ञा का पालन करता है, उनके बताए गए मार्ग पर चलता है। इस पद की शुभ होने पर ऑफिस, फैक्ट्री आदि में अधिनस्थ व्यक्ति अपने सीनियर के आदेश का पालन करते हैं।

विरुपाक्ष के रुप निर्माण का वर्णन – निर्ऋति मृत्यु को प्रदर्शित करती है। उसका वाहन ऊँट है। जो महा मोह को प्रदर्शित करता है। जब व्यक्ति मोह में होता है तो वह मृत्यु की ओर अग्रसर होता है। अमृता प्राप्त करने के लिए मोह नाश आवश्यक है।

दोष के लक्षण – जब इस पद में दोष होगा तो व्यक्ति को धन प्राप्ति में बाधा होगी, निर्धन होगा, अपमानित होगा, तिरस्कार मिलेगा। लोभी वह दम्भी होगा। धोखेबाजी का दुर्गुण भी आ सकता है। बेईमान होने की भी आशंका रहती है।

उपयोग – वरिष्ठ व्यक्ति का स्थान, माता का स्थान, पिता का स्थान, स्त्री का स्थान, खर्च का स्थान।

उपाय – तिल, पिंड व भात का हवन करें। भूमि के अंदर सीसा लगवाएं।

दौवारिकः- नंदी प्रमथाधिप (गणेश)

नंदी-सुखी, दौवारिक-द्वारपाल, जुआँ। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति अपने विषय का ज्ञाता होता है। वह अनावश्यक वस्तु को अपनी बुद्धि में प्रवेश नहीं करने देता है। अपने समय व पैसे का सदुपयोग करता है। उसकी कामनाएं उसके नियंत्रण में रहती है। जिससे वह हर्ष में रहता है। सुखी रहता है। इस पद की अशुभ होने पर व्यक्ति की ऊर्जा, समय व पैसा अनावश्यक खर्च होता है। समय व्यर्थ जाता है तथा कामनाएं नियंत्रण में ना होने से दुखी रहता है। प्रमथाधिप-प्रमथ शिवजी के गुण है, उनका स्वामी प्रमथाधिप हुआ अर्थात भगवान गणेश जो गणों के स्वामी हैं। यह बुद्धि रिद्धि और सिद्धि को देने वाले हैं। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति बुद्धि से युक्त होता है इसलिए इस स्थान को विद्याभ्यास के लिए शुभ बताया है।

उपयोग – रक्षक, द्वारपाल, शयन, ड्राइवर, मोर,कार्तिकेय, गणपति।

उपाय – मोर, कार्तिकेय का चित्र, लौंग का हवन करें। लौग खाएं। भोजन में उड़द के बड़े का प्रयोग करें। भोजन में लड्डू का प्रयोग करें। हवन में बीज (बीन) का प्रयोग करें। नंदी लगवाए।  गणपति के शुभ चिह्न हाथीदांत या गजमुख, कमल का चिह्न बनवाएं ।

सुग्रीव

 मनु-विद्वान, इसलिए इसे विद्या अध्ययन का स्थान कहा हैं। मनु शब्द का सम्बन्ध मन व मनुष्य दोंनो से है। इस आधार पर जब मनु के गुणों को देखने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि किसी विचार को क्रियान्वित करने की क्षमता सुग्रीव के पद में है। जब यह पद सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित रहता है तो व्यक्ति की मानसिक शक्ति बहुत ही केंद्रित होती है। ऐसा व्यक्ति अपने निश्चय को पूरा करने की पूरी क्षमता रखता है। सुग्रीव शब्द का अर्थ हंस भी बताया है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति सही व गलत का फर्क कर सही निर्णय लेता है। ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान व विद्वान होता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति का मन कमजोर होता है वह एकाग्रचित्त होकर कार्य नहीं कर पाता।

उपयोग – विद्या अभ्यास के लिए यह उपयुक्त पद है। मनन, चिंतन करने का उचित कक्ष बनवाया जा सकता है। प्लानिंग कक्ष का निर्माण किया जा सकता है।

सुधार के उपाय- भोजन में मोदक का प्रयोग करें। हवन में मोदक का प्रयोग करें। गणपति का स्थान। कार्तिकेय का स्थान। आयुधालय बनवाएं।

पुष्पदंतः- विनतातनयः  महाजव  वत्यु

पुष्पदंत को विनीता के पुत्र-पुत्री कहा। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति अच्छी बुद्धि वाला होता है। उसकी सोच, दृष्टि आदि शास्त्र पर आधारित होती है। इस पद में दोष होने पर वह दुर्बुद्धि वाला होता है।ं विनीता के पुत्र का अर्थ गरूड़ भी दिया। गरूड़ बहुत ही शीघ्र चलने वाले या उड़ने वाले है। गरुड़ मन को प्रदर्शित करता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति का मन शक्तिशाली होता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति दीर्घ-सूत्री होता है, कार्य करने में बहुत अधिक समय लगाता है। पुष्पदंत का अर्थ होता है – द्वार, विष्णु या शिव का सेवक। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति को उसके सहायक शीघ्र सहायता करते हैं। उसके सहायक, मित्र, नौकर आदि तत्परता से सहयोग के लिए उत्सुक रहते हैं। इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति को लोगों का सहयोग नहीं मिल पाता है। यह असहयोग मित्र, पत्नी आदि का हो सकता है।

उपयोग – सभी प्रकार से सहायक, नौकर, असिस्टेंट, रक्षक, ड्राइवर, सचिव, पुरोहित, अपने अस्त्र-शस्त्र (जैसे कार्य में आने वाले उपकरण, कलम, मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर आदि) के लिए उचित स्थान है। मुख्य द्वार के लिए यह उचित स्थान है। धन रखने के लिए यह उचित स्थान है। उत्तराधिकारी के लिए उचित स्थान है। फूल व जल रखने के लिए उचित स्थान है। प्रमुख व्यक्ति के लिए शुभ शान है।

उपाय – गदा व पाश भूमि के अंदर लगवाएं। भोजन में दूध व खीर का उपयोग करें। दूध व सफेद फूल, खीर का हवन करें ।

वरुणः- लोकपाल जल का स्वामी

यह देवताओं में प्रमुख है। सूर्य के सात रूप में यह सबसे प्रमुख है। पलक झपकते ही माया में बांध लेता है। औषधि, प्राणी, जल व देवताओं का राजा या स्वामी है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति राजा के समान गुणों से युक्त होता है। लोकपाल-रक्षक। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति सभी प्रकार से सुरक्षित रहता है। उसका मन, वैभव, यश, सुख आदि बना रहता है। इसका संबंध इंद्र, अग्नि, यम, मित्र व विष्णु से है। दीर्घायु प्रदान करता है। इसके अशुभ होने पर प्रोजेक्ट तैयार हो गया, चालू हो गया था, परंतु अब चल नहीं रहा है। इसके शुभ होने पर हमारे अंदर बुरे विचार नहीं आते हैं। यह विष्णु का भी एक नाम है, अतः भगवान विष्णु का फोटो आदि इस पद में पुर्वाभिमुख लगा सकते हैं। असुर, इसे असुर भी कहा गया है। अशुभ होने पर शरीर में पानी भर जाने का रोग हो जाता है। पाप को माफ करने वाला, शुभ होने पर पाप के कारण होने वाली ग्रंथि को समाप्त करता है।

वरुण- यह सूर्य का रात्रि का नाम है, जैसे सूर्य के दिन का नाम मित्र है। झूठ बोलने से घृणा करने वाला। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति झूठ बोलने वाले से संबंध नहीं रखता है। इस पद के शुभ होने पर पति-पत्नी में परस्पर प्रेम व सामंजस्य रहता है। इस पद में शयन कक्ष का निर्माण करना चाहिए ।

उपयोग – इस पद का उपयोग शयनकक्ष के रूप में किया जा सकता है। इस पद का उपयोग प्रमुख व्यक्ति के लिए कर सकते हैं। प्रमुख सहयोगी के लिए यह उपयुक्त स्थान है। धन रखने के लिए उपयुक्त स्थान है।

दोष के लक्षण –  लोगों का सहयोग ना मिलना। पति-पत्नी के मध्य सामंजस्य ना होना। सुख, यश, धन आदि का अभाव। कार्य करने मे सामथर््य न होना।

सुधार के उपाय – जो दोष है, जैसे कटना, फटना, गंदगी आदि उसे पहले दूर करें। इस पद में लाल कमल का उपयोग करें ।

असुर राहु

जब भी व्यक्ति राहु के प्रभाव से ग्रसित हुआ, तो राहु ने सूर्य (आत्मा, विल-पावर, आत्मविश्वास आदि) को ढक सा दिया, उसकी शक्ति को अवरूद्ध कर दिया तथा चंद्र (मन, मन की शक्ति) को ढक दिया या कमजोर कर दिया। सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो सद्बुद्धि को आच्छादित कर दिया, निर्णय लेने की क्षमता को ढक दिया तब व्यक्ति गलत निर्णय करता है दुखी रहता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति की विवेक शक्ति जागृत रहती है। सही निर्णय करता है, सुखी रहता है।

राहु-देवता मूर्ति प्रकरण – इस पद में द्वार होने पर राजदंड की आशंका रहती है। इसका तात्पर्य है कि यह पद राजकीय कार्य विभाग से संबंध रखता है। महेंद्र के पद में द्वार होने पर राजा की दया होती है। इसका तात्पर्य है कि महेंद्र और असुर के पद में दोष होने पर राजकीय विभाग से परेशानी रहती है। असुर का संबंध मन में उठने वाले गलत विचार, गलत लक्ष्य से किया। शास्त्र कहता है कि यदि किसी को गलत शब्द कहे तो वाणी का संयम करने का दंड दे अर्थात मौन रहे।

उपयोग – डस्टबिन रखने का स्थान, स्वामी भक्त या नौकर के रहने का स्थान, ड्रॉइंग रूम (पश्चिमी मुखी घर होने पर), स्टोर रूम, धनालय (समरांगण सूत्रधार), शयन कक्ष (अशुभ पद होने पर)।

शोष- शनिश्चरा, सौरि, सूर्यपुत्र

शोष शब्द का अर्थ है श्वास, प्राणशक्ति, सुखाना, उपभोग, दूर करना, खत्म करना, बड़े होने या सूजने की प्रक्रिया, सूजना (रोग आदि ट्यूमर आदि) टीबी बीमारी, फेफड़े से संबंधित रोग, श्वास से संबंधित रोग, प्राण शक्ति की कमी आदि। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति प्राण शक्ति से भरपूर होता है। इसके भरपूर होने पर व्यक्ति में रोग से लड़ने की क्षमता होती है, बीमार कम होता है। उस की रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति को टीबी या श्वास या फेफड़े से संबंधित रोग होने की आशंका होती है। इस पद में दोष होने पर सूजन से संबंधित रोग, किसी अंग या सेल का बढ़ना, ट्यूमर आदि होने की आशंका रहती है। इसका अर्थ नष्ट या समाप्त करने वाला भी दिया है। शनि का अर्थ है धीमी गति से चलने वाला। इसका जब अर्थ करेंगे तो कहेंगे इस पद में दोष होने के परिणाम स्वरूप जो रोग उत्पन्न हुआ, वह धीरे-धीरे ही समाप्त होगा। वास्तु में नकारात्मक ऊर्जा का आक्रमण इस दिशा से होता है। रोग व शत्रु का नाश भी इसी पद के शुभ होने पर होता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति विभिन्न विधाओं से निष्णात, विशेषज्ञ (कुशल) होता है तथा समय आने पर अपनी क्षमताओं का उपयोग करने में समर्थ होता है।

उपयोग – विश्वकर्म प्रकाश ग्रंथ में पश्चिम व वायव्य के मध्य रोदन गृह अर्थात नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालने का आसान बताया है। इस आधार पर इस पद में टांेयलेट, वॉश एरिया, डस्टबिन आदि रखने का स्थान बना सकते हैं। नौकर या सेवक आदि का कक्ष, नृत्य कक्ष, ड्राइवर आदि के लिए उपयुक्त। डस्टबिन रखने का स्थान।

उपाय – भूमि के अंदर गैरिक लगवाएं। तिल व चाँवल से हवन करें।

दोष – इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति छोटी-छोटी परेशानियों से भी घबरा जाता है।

उपयोग – नृत्य, संगीत आदि का कक्ष। श्वास, प्राणशक्ति, सूखा, उपभोग, दूर करना, खत्म करना, बड़े होने या सूजने की प्रक्रिया, सूजना, टीबी बीमारी, फेफड़े से संबंधित रोग, श्वास से संबंधित रोग, प्राणशक्ति की कमी।

पापयक्ष्माःरोगःक्षय

इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति का पतन नहीं होता। वह स्वस्थ रहता है तथा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। इसका अर्थ अस्थिरता से भी है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति का चित्त या मन अस्थिर रहता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति का स्वास्थ्य, धन, मान, प्रतिष्ठा आदि सबकुछ धीरे-धीरे कम होता जाता है। वह धीरे-धीरे बीमार होकर रोगी हो जाता है।

दोष – इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति की प्रगति रुक जाती है तथा धीरे-धीरे नीचे की ओर जाता है। उसका धन-यश आदि नष्ट हो जाते हैं। इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति रोग से ग्रस्त हो जाता है। इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति के शत्रु या प्रतिद्वंदी उस पर हावी रहते हैं।

उपयोग – औषधि रखने का स्थान, वायु रहित स्थान, बंद कमरा, ओखली का स्थान, नृत्य का स्थान, विद्या अभ्यास का स्थान, वादक का शयन।

उपाय – भोजन में यव का प्रयोग करें। यव का हवन करें। एलालता भूमि के अंदर लगवाएं। शूल का चिह्न भूमि के अंदर स्थापित करें।

मारुतः-रोग-ज्वर

इस पद में दोष होने पर व्यक्ति चंचल, लोभी तथा बहुत कामना रखने वाला होता है। जिससे वह अशांत रहता है। सामाजिक संबंधों में भी दिखावा रखने वाला होता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति वायु रोग से पीड़ित रहता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति दुखी रहता है।

ज्वर – ज्वर को सभी रोगों का मुखिया या राजा बताया है। शारीरिक, मानसिक आदि सभी प्रकार के रोगों का यह कारण भूत है। इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा या मानसिक वेदना होती है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति शारीरिक पीड़ा व मानसिक वेदना से मुक्त रहता है। इस पद में द्वार होने पर व्यक्ति को बंधन तथा मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति ज्वर से पीड़ित रहता है।

उपयोग – पूरी तरह बंद रखना चाहिए। जल स्थान बनवाना चाहिए। पानी का क्रीड़ा स्थल।

उपाय – भूमि के अंदर महानील लगवाएं। भूमि के अंदर सोना लगवाएं। भोजन में सर्वोषधि, घी व हल्दी व भात का प्रयोग करें। सर्व औषधी, घी व हल्दी व भात का हवन करें। भूमि के अंदर कुलूत्थ कुलथी लगवाएं। विद्या अभ्यास का कक्ष।

नागः-वासुकी

इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति अच्छा शिक्षक, रचयिता व प्रतिष्ठित होता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति धन से संपन्न होता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ तथा कार्य में निपुण होता है।

दोष- इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति क्रूर व अत्याचारी होता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति को अपयश मिलता है। द्वार होने पर शत्रुता होती है।

उपयोग – लंबा सरोवर के लिए उपयुक्त स्थान है। आया, सचिव, निजी सचिव के लिए उपयुक्त स्थान है। चश्मे की दुकान। नेत्र विशेषज्ञ, स्थपति व नेत्र विशेषज्ञ का शयनकक्ष, भंडार ग्रह, ब्रह्मणों के लिए हवन।

उपाय – घी, लाजा व औषधि का हवन करें। भोजन में जायफल का प्रयोग करें। जायफल का हवन करें। घी व खीर का प्रयोग भोजन में करें।

मुख्यः- (त्वष्टा, विश्वकर्मा)

इस पद का नाम इसके गुणों को प्रकट करता है। इसका नाम है मुख्य जिसका अर्थ है प्रमुख या खास। नाम के अनुरूप इस पद के शुभ होने पर स्थान के सबसे प्रमुख व्यक्ति को लाभ प्रदान करता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति विद्वान, लीडर, मुखिया या मार्गदर्शक होता है, लोगों का जीवन संवारने में उसका प्रमुख योगदान रहता है। इसी प्रकार इस पद के शुभ होने पर व्यक्तित्व में गढ़ना या निखरना या सुधार होता है। वह विभिन्न विद्याओं में निष्णात या कुशल होता है। वह अन्य लोगों को गढ़ने की क्षमता रखता है। विश्वकर्मा जी के चार मुख हैं, उनके हाथों में क्रमशः माला, पुस्तक, कमंडल व वरद मुद्रा है, वे त्रिनेत्रधारी हैं, उनकी जटा में चंद्रमा है। अन्य ग्रंथ में उनका वाहन हंस बताया है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति शास्त्र के बताए अनुसार मार्ग पर चलता है, उसकी इच्छाएं पूरी होती है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति में सही और गलत का अंतर स्पष्ट कर सही निर्णय लेने की क्षमता होती है। उसी प्रकार इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति इस प्रकार के गुणों से युक्त होता है कि वह अन्य व्यक्तियों को भी तराशकर मूल्यवान बना देता है। ऑफिस, फैक्ट्री या इंडस्ट्री के संदर्भ में कहेंगे कि इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति अपने अधीनस्थ व्यक्तियों की प्रतिभा का पूरा दोहन करने में सक्षम होता है। इस पद की शुभ होने पर व्यक्ति ज्ञान से युक्त होता है। व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा के प्रति अधिक जागरूक रहता है। उसे मान-सम्मान यश, पद व प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

मुख्य – जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है यह मुखिया खास पद होता है। विश्वकर्मा, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है विश्व के कर्म या कार्य को करने वाला, सभी प्रकार की क्रिएटिव कार्य को करने वाला। यह पद उस रचनात्मक, नए व क्रिएटिव आईडिया से संबंध रखता है। इस पद में दोष होने पर व्यक्ति की रचनात्मक शक्ति कार्य नहीं कर पाती वह उस दिशा में सोच नहीं पाता है। यह स्थान विद्या अभ्यास के लिए शुभ बताया है। किसी भी तकनीकी या शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह पद शुभ है।

दोष – इस पद में दोष होने पर विद्या को ग्रहण करने में बाधा होती है, समझ में नहीं आती। उसके मान, सम्मान, प्रतिष्ठा में कमी रहती है। उसे यश प्राप्त नहीं होता है। रचनात्मक कार्य की सोच विकसित नहीं हो पाती है।

उपयोग – द्वार के लिए उचित स्थान है। इस स्थान पर द्वार होने से पुत्र, पौत्र धन-धान्य, वाहन आदि का सुख प्राप्त होता है। शयनकक्ष हेतु उचित पद है। धन-धान्य, आभूषण, सोना,रत्न आदि रखने के लिए उत्तम पद है। विद्या अभ्यास के लिए शुभ स्थान है। पानी के निकास के लिए शुभ पद है। फूलों का बगीचा बनाने के लिए शुभ स्थान है। अध्ययन, अध्यापन, शिक्षण के लिए शुभ पद है। सभी प्रकार की क्रिएटिव गतिविधि के लिए शुभ पद है। प्लानिंग, योजना आदि सभी कार्य के लिए शुभ है। नेत्र विशेषज्ञ के लिए शुभ पद है। व्यापारी के बेचने के लिए शुभ पद है। ओखली के लिए भी शुभ स्थान है। कन्या के लिए यह पद शुभ बताया है।

उपाय – भोजन में आटा, दही व घी का प्रयोग करना चाहिए। भूमि के ऊपर गजमुख लगवा सकते हैं। अंकुश व पाश का चिन्ह धातु में बनवाकर भूमि के अंदर लगवाना चाहिए।

भल्लाटचंद्र

भल्लाट – भल्लाट के पद में सफेद रंग का प्रयोग करना चाहिए। इस पद में सफेद कमल का चित्र आदि भी शुभ है। इन्हीं अश्वों से ही चन्द्र, दशों दिशाओं मे यात्रा करते है। जैसा कि हम जानते हैं कि चंद्रमा मन को प्रदर्शित करता है। भल्लाट का पद शुभ होने पर चंद्र या मन सशक्त होता है, जिससे परिणाम स्वरूप अन्य पद शुभ होने पर अपना प्रभाव देते हैं। चंद्रमा सब लोग का पिता कहा गया ह,ै उसकी सृष्टि होने पर ही सारा संसार उत्पन्न होता है। उसे महात्मा विष्णु की उत्कृष्ट सौम्य मूर्ति समझनी चाहिए। यहां भी सूर्य के समान, चंद्र की ध्वजा को सिंह से अंकित है। सिंह यहां भी धर्म का ही प्रतीक है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति, राजा के समान गुणों से युक्त वाला होता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति, स्वयं के मन पर संयम रखने वाला होता है। उसका मन उसके वश में रहता है। मानसिक रूप से बलशाली होता है। वह व्यवहार में मनोहर होता है। इस प्रकार का व्यक्तित्व होता है जिससे लोग आकर्षित होते हैं। वह व्याकरण का ज्ञाता होता है।

दोष – इस पद में दोष होने पर व्यक्तित्व प्रभावशाली नहीं हो पाता है। उसका मन उसके वश में नहीं रहता है, इंद्रियों के अधीन रहने से विषय सुख की ओर भागता रहता है। किसी बात पर स्थिर नहीं रह पाता है। उसमें हर्ष व प्रसन्नता का अभाव रहता है।

उपयोग – यह पद द्वार के लिए शुभ है इस स्थान पर द्वार होने पर व्यक्ति पुत्र, पौत्र, धन-वाहन आदि का सुख प्राप्त करता है। शयनकक्ष के लिए यह पद शुभ है। अतिथि कक्ष, औषधि कक्ष, नौकर, वाहन, नृत्य, जल, फूलों का बगीचा, विद्याभ्यास आदि के लिए यह पद शुभ है।

उपाय – भोजन में गुड़ वह भात का प्रयोग करना चाहिए। गुड़ व भात से हवन करना चाहिए। मेष का मुख धातु में लगवाना चाहिए। जब कक्ष का उपयोग विद्याभ्यास के लिए किया जाता हो, तब सरस्वती जी की मूर्ति कक्ष में रखनी चाहिए, भूमि के अंदर भी स्थापित कर सकते हैं।

सोमः-कुबेर

कुबेर – धन कुबेर को कमल पत्र तथा स्वर्ण की क्रांति वाला, मनुष्य वाहन वाला तथा सभी आभूषणों से आभूषित करना चाहिए। कुबेर की पूजा करने से मानो पूरे संसार की पूजा हो गई। सोम का यह पल कुबेर के नाम से बताया गया है। कुबेर एक यक्ष है। यह धन का स्वामी है, खजांची है। सामान्य रूप से इसका अर्थ धीमा या आलसी भी किया है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति धनवान होता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति होती है। यहां द्वार होने पर व्यक्ति पुत्र, पौत्र, धन, सुख आदि का स्वामी होता है।

दोष – इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति आलसी, धन का नाश करने वाला, व्यसनी होता है। यह पद शयन, ड्रॉइंग रूम आदि के लिए शुभ है। यह पद तिजोरी रखनेे के लिए, नौकर के लिए, प्रसूतिका के लिए तथा प्रवचन सुनने के लिए भी शुभ है।

उपाय – खीर, दूध व भात का भोजन करें। शहद, तिल तथा मूंग का प्रयोग भोजन में करना चाहिए। शहद, सफेद कमल, खीर, तिल, मूंग, दूध, भात का हवन करना चाहिए। चांदी का घोड़ा, चांदी का दर्पण लगवाना चाहिए। चांदी का चंद्रमा, घोड़ा, दर्पण लगवाना चाहिए। भूमि के अंदर पारा रखना चाहिए। भरा हुआ कलश रखना चाहिए। सोने से बने हुए शंख, गदा, कमल, रत्न का पात्र भूमि के अंदर रखना चाहिए। कपूर रखना चाहिए।

भुंजगः-चरक-व्यवसाय,हिमवान-शैल

चरक – चरक, आयुर्वेद के ग्रंथ का नाम है। इस शब्द का अर्थ चिकित्सक, जिज्ञासु, घूमने वाला तथा कोशकार होता है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति चिकित्सक के गुणों से युक्त किसी भी बीमारी या रोग या समस्या का निराकरण करने, उसके लिए उपयुक्त औषधि देने में सक्षम होता है।

दोष – इस पर के अशुभ होने पर व्यक्ति में सीखने आदि की उत्सुकता नहीं रहती है तथा आलसी रहता है।

शैल – इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति अपने इरादे में पक्का होता है, दृढ़ निश्चय होता है। इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति के लक्ष्य व इरादे बदलते रहता है।

व्यवसाय – इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति उत्साही, कार्यरत, प्रयत्नशील, साहसी व जुझारू प्रवृत्ति का होता है। लगातार उद्यम में लगा रहता है। इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति आलसी होता है।

उपयोग – शयन कक्ष के लिए इस पद का उपयोग शुभ है। यह स्थान मालिश करने वालों के लिए उचित है। लंबा जलाशय इस पद में बनाया जा सकता हैं। सोना, रत्न, गंध आदि के लिए उचित स्थान है। विद्याभ्यास के लिए शुभ स्थान है।

उपाय – सत्तु का प्रयोग भोजन में करना चाहिए। सत्तू का हवन करना चाहिए।

अदिति-श्री-लक्ष्मी

यह पद सौभाग्य, समृद्धि, सफलता, संपत्ति, सुंदरता, प्रसिद्धि, यश को प्रदर्शित करता है। इस पद का संबंध धर्म, अर्थ काम से है। इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति सौभाग्यशाली, प्रसिद्ध व धनवान होता है। अदिति को देवताओं की माता बताया है, यह दक्ष की पुत्री है, यह मातृशक्ति है। इसी से सकारात्मक ऊर्जा का जन्म हुआ है। इस पद के सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होने पर व्यक्ति के अंदर अच्छे विचार उत्पन्न होते हैं, जिससे वह प्रगति की ओर बढ़ता है। अदिति को दक्ष की पुत्री बताया है, लक्ष्य का संबंध दक्षता से है, कुशलता से है, निपुणता से है। उनसे ही देवता, दानव, नाग आदि उत्पन्न हुए। दक्षता का संबंध जिस विधा से हुआ, व्यक्ति उसी विधा का विशेषज्ञ बन गया। इसलिए यह ध्यान, योजना, प्लानिंग आदि के लिए शुभ स्थान है। समरांगण सूत्रधार में अदिति का निघंटु लक्ष्मी दिया है इस पद के शुभ होने पर व्यक्ति धनवान होता है। यह धन रखने के लिए भी शुभ स्थान है।

दोष – इस पद के अशुभ होने पर व्यक्ति को कार्य में सफलता नहीं मिलती है तथा वह धन व यश को प्राप्त करने में असफल रहता है। इस पद में द्वार होने पर स्त्री दोष की उत्पत्ति होती है।

उपयोग – यह स्थान वैद्य के लिए शुभ है। यह पूजन का स्थान है। अतिथि गृह के लिए शुभ पद है। स्नान के लिए शुभ पद है। शयन के लिए एक उचित पद है।

उपाय – भोजन में लपसी का प्रयोग करें। भूमि के अंदर खड़्ग का चिन्ह धातु में बनवाकर रखना चाहिए। भूमि के अंदर गंधक रखना चाहिए। भोजन में मोदक का प्रयोग करना चाहिए। दो हाथी, बिल्व, कमल, अमृत, कलश, शंख का चिन्ह बनवाकर भूमि के अंदर स्थापित करें।

दिति:- शुलभृद वृषभध्वज शर्व

यह सभी भगवान शंकर के नाम है। अर्धनारीश्वर का अर्थ है विषय को पूरा जानना, पक्ष व विपक्ष, नर व नारी। जब यह पद नकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होता है तो व्यक्ति एक ही पक्ष को जानता है, दूसरे पक्ष से पूरी तरह अनजान रहता है। इसके परिणामस्वरूप निर्धनता, अपयश आदि को प्राप्त होता है। इस पद में द्वार होने पर निर्धनता होती है। इस पद के सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित होने पर व्यक्ति कार्य में कुशल, विषय को सभी और से जानने वाला, सही विचार व चिंतन करने वाला होता है। इसके फलस्वरूप वह धनवान होता है।

उपयोग- शयन के लिए शुभ ह। स्नान के लिए शुभ है। वैद्य के लिए शुभ है।

उपाय – सिंह मुख, भूमि के अंदर लगवाए। भूमि के अंदर त्रिशूल लगवाएं। गदा, धातु में बनवा कर भूमि के अंदर लगवाएं। तिल व पुरी का प्रयोग भोजन में करें।

स्थापत्य वेद शिक्षण एवं शोध संस्थान के प्रकाशन

राजवल्लभ (संस्कृत व हिंदी)

मानसार-(हिंदी)

मयमत-(हिंदी)

विश्वकर्मा प्रकाश (संस्कृत व हिंदी)

अग्नि पुराण के अनुसार वास्तु (संस्कृत व हिंदी)

मत्स्य पुराण के अनुसार वास्तु (संस्कृत व हिंदी)

समरांगण सूत्रधार (संस्कृत व हिंदी)।

Dr. A K Jain
368, Prem Kutir, University Main Road
Near Tulsi Garden, Udaipur – 313001
Rajasthan
86905 71683

 

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This Post Has 20 Comments

  1. Arti Srivastava

    Very valuable information 👌

    1. SANJAY SAMPATLAL DARDA

      Sir Vastu 45 Devata information is very nice & life time useful .
      Sir this information is vastu Shastra NIV ( gramar. )
      Sir in S E Zone is SHUKRACHARYA & that Zoine in putt the Mata Laxmi & Shree Ganesh Photo.

  2. Ramu Singh

    अच्छी जानकारी

  3. Kailash vats

    Very nice

  4. Vitthal Bhima Hotkar

    Itne gahri se jankari de ne ke liye dhanyavad sir

    1. Piyush Sawant

      Yes sir great information

  5. Piyush Sawant

    Very brief….. Update knowledge.

    Ver few people knows about Brahma Surya Budha .

    Thanks

  6. Narendra Pachare

    45 devta onki jankari mili
    Upay air dosh kaise kare iski jankari mili

  7. Vitthal Hotkar

    Bahot hi achi jankari

  8. Jyoti

    Very informative

  9. Anisha

    Very good information explained in brief

  10. Sitaram Keshri

    45 देवताओं का वास घर में रहता है।
    इनके वास स्थान को प्रणाम।

  11. Udit shreemal

    Nice information

  12. Geetanjali

    Very good sir ji

  13. GANESH BHOPE GURUJI

    ब्रम्ह स्थान 45 देवता दिशा ब्रह्म स्थान का दोष or उसके उपाय पुरी जाणकार समाज आया. धन्यवाद

  14. Mamthaa Jain

    Devtao se saat saat unki disha bhi nirdeshit kar dete toh sone pe suhaaga ho jata “most valuable information ever!!”

  15. Chandrajit

    Nice

  16. Pranali_B

    Bramh Sthan Kitna imp h yha clear huva sir…

  17. Chandranath Mukherjee

    Nice sir, bahut kuch jan paya

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