वास्तु शास्त्र का स्वास्थ्य से संबंध

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स्वास्थ्य के लिए विभिन्न वास्तु आयाम:

 वैदिक वास्तु शास्त्र में वर्णित सभी दिशा निर्देश पंचतत्व के सिद्धांत के आसपास घूमते हैं। सृष्टि मानव जीवन पर्यावरण एवं प्रकृति आदि सभी कुछ पांच तत्वों के संतुलन के नियमों पर आधारित है। वह यह सभी इन्हीं नियमों के अधीन चलते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि सृष्टि के पांचों तत्वों में थोड़ा सा भी और संतुलन हो जाए तो एक असहज स्थिति पैदा हो जाती है।

 उदाहरण के लिए, यदि हम पर्यावरण को ही ले तो किसी भी तत्व की जागृति या कमी के कारण सब कुछ डावाडोल होता प्रतीत होता है। मनुष्य के अस्तित्व के लिए एक निश्चित मात्रा में जल, सूरज की धूप, भूमि के लवण एवं एक समुचित अनुपात की गैसों से बनी वायु सभी कुछ संतुलित होना चाहिए।  तभी सृष्टि का घटनाक्रम सुचारु रुप से चलेगा इसी प्रकार हमारे शरीर को एक निश्चित मात्रा में जल उष्णता नमी वायु खनिज आदि सब कुछ चाहिए वास्तु शास्त्र में उपरोक्त सभी तत्वों में से प्रत्येक के लिए एक निश्चित दिशा निर्धारित होती है। हर दिशा का संबंध हमारे जीवन के सभी पहलुओं से है, जो कि हमारे आर्थिक विकास सामाजिक प्रतिष्ठा मानसिक संतुलन एवं शारीरिक स्वास्थ्य से संबंधित है।

 जहां तक एक अच्छे स्वास्थ्य का संबंध है सो वास्तु में बताई गई हर एक दिशा एवं विदिशा हमारे स्वास्थ्य के विभिन्न आयामों के लिए काफी हद तक अपना विशेष रोल अदा कर सकती है।

पूर्वोत्तर में स्थित ईशान कोण :-

 सौम्या-शीतल गुणों से भरपूर पूर्वोत्तर में स्थित ईशान कोण में रहने वाले व्यक्तियों का रक्तचाप स्वत: ही बाकी दिशाओं की तुलना में उत्तम रह सकता है। जबकि दक्षिण पूर्व की उपदिशा जिसे वास्तु की शब्दावली में आग्नेय कोण कहते हैं। इसमें स्थित किसी कमरे में रहने वाले सदस्य को उच्च रक्तचाप की संभावना बढ़ जाती है,क्योंकि यह किसी भी भवन का सबसे गर्म स्थान होता है वह इसीलिए दक्षिण पूर्व को वास्तु शास्त्र में अग्नि का स्थान बताया गया है। इसी प्रकार हृदय से संबंध व्यक्तियों से ग्रस्त या ऐसी ही किसी संभावना वाले व्यक्ति को आग्नेय कोण में बने कक्ष में लंबे समय तक रहना नहीं चाहिए।

घर के बड़े सदस्यों की दिशा :-

 उम्र में बढ़ने के साथ-साथ प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करने के बाद से वृद्धावस्था तक प्रायः व्यक्ति को अनेकों छोटी-बड़ी बीमारियां घेरने लगती है। जैसे जोड़ों में दर्द,आर्थराइटिस शरीर में शक्ति का हास्य, पाचन संबंधी परेशानियां या फिर ऐसे ही अन्य रोग इन सब पर नियंत्रण करके इनके प्रभाव को कम करने के लिए किसी भी भवन की दक्षिण पश्चिम दिशा में बने कमरे में रहना चाहिए, यहां पर शरीर की कोशिकाओं एवं स्नायु को आवश्यक सकारात्मक ऊर्जा मिलती है, वह सर्दियों में अपराहन की धूप के प्रभाव के कारण यहां पर शरीर को गर्माहट कैल्शियम एवं फास्फोरस भी पर्याप्त मात्रा में मिलता है, जिससे हड्डियों को शक्ति मिलती है, इसलिए वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के बड़े सदस्यों जैसे माता-पिता, दादा-दादी आदि को दक्षिण पश्चिम की उप दिशा में स्थित नैऋतय कोण में बने कमरे में रखने की सिफारिश की जाती है।

फेफड़ों एवं त्वचा से संबंधित दिशा:-

स्वास एवं त्वचा से संबंधित रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों व सदस्यों को किसी भी भवन की पश्चिमोत्तर उपदिशा में बने कमरों में रहना चाहिएA वास्तव में यह दिशा वायव्य कोण के नाम से जानी जाती है, इस दिशा में वायु का संचरण अन्य सभी दिशाओं की तुलना में सर्वाधिक होता हैA फलत% ऑक्सीजन की मात्रा भी स्वयं ही यहां पर ज्यादा होती हैA वह इस दिशा का यह नैसर्गिक गुण त्वचा एवं शोषण से संबंधित समस्याओं के प्राकृतिक उपचार में काफी लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। यदि भवन में वायु का समुचित प्रबंध ना हो तो भी फेफड़ों एवं त्वचा से संबंधित रोगों की संभावना बढ़ जाती है।

 वास्तु अनुसार आंखों से संबंधित व्याधियों से बचाव एवं उपचार हेतु भवन की पूर्व दिशा में बने कमरे में रहना, सुबह जल्दी उठना एवं भवन के आसपास घास के किसी भी मैदान में नंगे पांव टहलना स्वास्थ्य लाभ दे सकता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार हर रोज प्रातः सूर्योदय के समय उठना एवं उगते सूरज को सिर की ऊंचाई से देखना ज्यादा ऊपर से हाथों द्वारा या लोटे या ऐसे ही पात्र से अर्क देना आंखों के लिए अमृत समान है। जिसमें पूर्णता खुली आंखों से अर्क  की चादर के उस पार सूरज की निर्मल किरणों को देखना और भी उत्तम रहता है।

पेट के स्वास्थ्य हेतु संवेदनशील दिशा

 यदि किसी को उधर से संबंधित व्याधि हो, तो वास्तु शास्त्र के अनुसार यह ध्यान से देखें, कि कहीं भवन के बीचो बीच में मध्य में स्थित ब्रह्म स्थान भारी ना हो गया हो। ब्रह्मस्थान प्रयोग किसी भी मकान के निर्मित भाग के मध्य में कम से कम एक तिहाई होता है। यहां पर कोई भारी वजन जैसे अनाज का भंडारण, भारी फर्नीचर, कॉलम ,बोरवेल, शौचालय, रसोई तो नहीं है, क्योंकि ऐसा होने पर ही काल्पनिक वास्तु पुरुष के पेट का भाग नकारात्मक हो जाता है। वह ऐसे में भवन के मुखिया को उधर से संबंधित रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

प्रयास करें की किसी भी भवन के मध्य में उपरोक्त में से कुछ भी बना हुआ ना हो, इतना ही नहीं हम सभी के उत्तम स्वास्थ्य के लिए जरूरी है कि भवन की लॉबी और फैमिली लांज में सामान अस्त व्यस्त न फैला हो।

सफाई से हमारा है गहरा नाता

वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी भवन में टूटा-फूटा, सामान, स्क्रैप, बेकार चीजें, जरूरत से ज्यादा शोपीस, कैलेंडर, दीवार घड़ी या कारपेट आदि नहीं होने चाहिए। लाइट ओपन को स्लैब खिड़कियां एवं फर्नीचर पर जमी धूल मिट्टी हमारे स्वास्थ्य को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाते हैं, अतः संपूर्ण घर साफ सुथरा एवं हवादार होना चाहिए।

 

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This Post Has 35 Comments

  1. Santoshi Tudu

    सर ,नृत्य में जीवन का जो टारगेट है वह फुलफिल करने के लिए रहना चाहिए तो बुजुर्ग अगर रहेंगे तो वह हमारे टारगेट कैसे फुलफिल होगा? स्पष्ट कर दीजिए।

    1. Srushti Utekar

      घर की दिशा समजणा जरुरी है 🙏

      1. DIPAKBHAI SONAGARA

        Sabhi disao ke upgog se kai rogo ke nivaran ki aachi jankariya hai .verry good

      2. Narendra Pachare

        Kuch bimari ho to kid disha me rahena chahiye iski bahut acchi jankari mili sir

        1. Udit shreemal

          Nice

        2. Sanchita sadanand chaitanya

          Ghar ki disha samajna jaruri he

    2. Nirmala gahtori

      बहुत ही सुन्दर जानकारी

  2. Bidyut

    Very good information

  3. SANDEEP KUMAR SAHU

    Amazing 👌

  4. Goldi babbar

    Nice

  5. Goldi babbar

    Really Nice

  6. dharmendra

    nice

    1. Hamaare swasth ke upar bhi vastu ka bisesh prabhaav rahta hai, jaise agneya disha me shone se bp high rahte hai, ishan mein normal, usitarha naitik disha mein pouda avastha se hi rahne se vriddha avastha mein hone wale swasth sambandhi problem kam hota hai

  7. Akhilesh gupta

    Vastu

    1. Kailash vats

      Kailash vats

  8. Arti Srivastava

    Very useful information

  9. SANJAY SAMPATLAL DARDA

    Very , very useful & important information
    Sir apko bahot bahot Dhanyawad aap game itni important information dete hai

    Very very nice

  10. Sneha

    Amazing. Bhut achhi Or useful information h. Dhanywaad guru ji🙏

  11. Jyoti

    Very well explained

    1. VAIBHAV JAIN

      V. Nice… Sir
      Thanks a lot

  12. Sitaram Keshri

    ईशान कोण में रहने वाले व्यक्तियों का रक्तचाप स्वत ही बाकी दिशाओं की तुलना में उत्तम रह सकता है। नैऋत्य कोण में बड़े सदस्यों का कमरा होना चाहिए। भवन में वायु का समुचित प्रबंध हो तो फेफड़ों एवं त्वचा से संबंधित रोगों की संभावना कम हो जाती है और ना हो तो संभावना बढ़ जाती है। ब्रह्म स्थान खाली होने पर पेट से संबंधित बीमारी नहीं होती है।

  13. Geetanjali

    Great sir ji 👍

  14. GANESH BHOPE GURUJI

    Saf sutra sundar rakhna jaruri hai, nice information .thanks sir ji

  15. Udit shreemal

    Nice information

  16. Pranali_B

    Nice

  17. Mamthaa Jain

    Very important and useful information 👌🏻

    1. Manish Chakraborty

      Okay sir

  18. aditya

    Very nice information

  19. Shweta chundawat

    सर आपके द्वारा बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया गया।

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