एक बच्चे और एक बुजुर्ग के शरीर में क्या अन्तर है?

प्राण उर्जा के कारण ये अन्तर है। प्राण उर्जा जितनी ताकतवर होगी व्यक्ति के लिए उतना ही अच्छा होगा – हर दृष्टि से शरीर, व्यवहार, समृद्वि आदि। इस प्राण उर्जा को बलवान बनाने का तरीका है – ‘ध्यान‘। 

चित्त को एक जगह लगाना ही ‘ध्यान‘  है। इसे हम मेडिटेशन भी कहते हैं। यह प्रकृति माँ का नियम है कि जहाँ हम ध्यान लगाते हैं उस चीज का विस्तार होता है। मेडिटेशन के कई प्रकार व विधियां हैं। इनमें से अधिकतर मेडिटेशन में हम अपनी श्वांसों पर ध्यान लगाते हैं। यानि आती व जाती हुई श्वांस को देखते हैं। इससे हमारी प्राण उर्जा का बल मिलता है।

इसके अलावा हम हमारे 13 चैतन्य केन्द्रो पर ध्यान देंगे तो भी हमारी प्राण उर्जा को बल मिलेगा।

हम जो कुछ हैं वह हमारा दिमाग है। आपने सुना होगा कि दिमाग के दो भाग हैं – 1. Consiuous Mind (चेतन मन) – 2 Sub-Consiuous Mind (अवचेतन मन)

Sub-Consiuous Mind या अवचेतन मन, चेतन मन से ज्यादा शक्तिशाली होता है। इसमें रखी गई Information अनुसार हमारा व्यवहार होता है। हमारी आदतें होती हैं।

हमारे शरीर में जितनी भी ग्रन्थियों हैं, ये सब अवचेतन मन हैं। यह मस्तिष्क को भी प्रभावित करती हैं, इसलिए मस्तिष्क से भी अधिक मूल्यवान हैं। विज्ञान अभी ये बताने में समर्थ नहीं है कि ग्रन्थियों की जागृति के सही साधन क्या हैं? अध्यात्म के पास उत्तर है – और यह उत्तर प्रयोगात्मक है। हम चैतन्य केन्द्रो पर ध्यान करेंगे तो वे संतुलित होंगे। उनके सन्तुलन से भय मुक्ति, आवेग समाप्त होंगे, सारी बाधाऐं समाप्त होंगी, उत्तम स्वास्थ्य मिलेगा, नए आयाम मिलंेगे, नई स्फूर्ति नया उल्लास प्राप्त होगा। 

चैतन्य-केन्द्र-प्रेक्षा

(‘‘चैतन्य-केन्द्र-पे्रक्षा जागरण की प्रक्रिया है। सुप्त चैतन्य-केन्द्रो को प्रेक्षा के द्वारा जागृत करना है। चैतन्य-केन्द्र-प्रेक्षा में प्रत्येक केन्द्र पर चित को केन्द्रित करें। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनों का अनुभव करें। गहरी एकाग्रता, पूरी जागरूकता  बनी रहे। केवल देखे। जानें। अनुभव करे। द्रष्टा भाव से प्रेक्षा करें। आगे से पीछे सुषुम्ना  तक मस्तिष्क के पीछे की दीवार तक पूरे भाग में चिंत के प्रकाश को फैलाएं। सुप्त चैतन्य-केन्द्रों को प्रेक्षा के द्वारा जागृत करें। प्रत्येक केंद्र पर ध्यान करें और वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें।‘‘

  1. शक्ति -केन्द्र- चित को शक्ति-केन्द्र-पृष्ठरज्जु के निचले सिरे पर केन्द्रित करें। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों को अनुभव करें।
  2. स्वास्थ्य केन्द्र- चित को तैजस केन्द्र- पेडू के मध्य भाग पर केन्द्रित करें। आगे से पीछे सुषुम्ना तक चित के प्रकाश को फैलाएं जाए। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें।
  3. तैजस केन्द्र – चित को तैजस केन्द्र – नाभि के स्थान पर केन्द्रित करें। आगे से पीछे सुषुम्ना तक पुरे भाग मे चित्त को फैलाए। जैसे टाॅर्च का प्रकाश सीधी रेखा में फैलता है, वैसे ही चित्त के प्रकाश को सीधी रेखा में पीछे फैलाएं। वहां पर होने वाले प्राण प्रकंपनों का अनुभव करें। गहरी एकाग्रता और पूरी जागरूकता के साथ प्रेक्षा करें, जिससे स्वतः ही श्वास-संयम हो जाए।
  4. आनन्द केन्द्र- चित को आनन्द केन्द्र- हृदय के पास (दोनों फुफ्फुस के बीच में) जो गड्डा है, वहाँ पर केन्द्रित करें। आगे से पीछे सुषुम्ना तक टार्च के प्रकाश की भांति चित के प्रकाश को फैलाएं और वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनों का अनुभव करे।
  5. विशुद्धि केन्द्र– चित को विशुद्धि केन्द्र-कण्ठ के मध्य भाग पर केन्द्रित करे। आगे से पीछे सुषुम्ना तक चित के प्रकाश को पृष्ठ भाग में फैलाएं। वहां होने वाले प्राण के प्रकम्पनो का अनुभव करें।
  6. ब्रह्म केन्द्र- चित कोब्रह्म केन्द्र-जीभ के अग्र भाग पर केन्द्रित करें। जीभअधर में रहे। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनों का अनुभव करें।
  7. प्राण केन्द्र- चित को प्राण केन्द्र-नासाग्र पर केन्द्रित करें। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनोंका अनुभव करे।
  8. अप्रमाद केन्द्र- चित को दोनो कानों पर-भीतरी, मध्य और बाहरी भाग पर तथा आस-पास के भाग पर केन्द्रित करें। वहां पर होने वाले प्राणके प्रकंपनो का अनुभव करें।
  9. चाक्षुष केन्द्र- चित को चाक्षुष केन्द्र-दोनों आंखोंके भीतर केन्द्रित करें। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनों का अनुभव करे।
  10. दर्शन केन्द्र- चित को दोनो आंखों और भृकुटियों के मध्य भाग पर केन्द्रित करें। भीतर गहराई तक ले जाएं। आगे से पीछे-मस्तिष्क के पीछे की दीवार तक चित के प्रकाश को फैला दें। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें।
  11. ज्योति केन्द्र- चित को ललाट के मध्य भाग पर केन्द्रित करें। भीतर गहराई तक चित को ले जाएं। आगे से पीछे मस्तक के पीछे के भाग में चित के प्रकाशको फैलाएं। वहां होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें।
  12. शांति केन्द्र- चित को सिर के अग्र भाग पर केन्द्रित करें, जैसे दीये का प्रकाश चारों दिशाओं में फैलाता है वैसे चित का प्रकाश चारों दिशाओं में फैलाएं। भीतर गहराई तक चित को ले जाएं। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनों का अनुभव करें।
  13. ज्ञान-केन्द्र- चित को ज्ञान केन्द्र- सिर के ऊपर के भाग, चोटी के स्थान पर केन्द्रित करें। दीये के प्रकाश की भांति पूरेभाग में चित के प्रकाश को फैलाएं। भीतर गहरे तक चित को ले जाएं। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनों का अनुभव करें।

अब एक साथ सभी चैतन्य  केन्द्रों की प्रेक्षा करें। जो खड़े-खडे कर सकते है, वे खड़े-खड़े करे।

  1. चित को शक्ति केन्द्र पर ले जाएं, फिर क्रमशः स्वास्थ्य केन्द्र, तैजस केन्द्र, आनन्द केन्द्र……..आदि प्रत्येक चैतन्य केन्द्र की यात्रा करते हुए पुनः शक्ति केन्द्र पर ले आंए।
  2. वृ त्ता कार में सभी चैतन्य केन्द्रों पर चित की यात्रा करें।
  3. तेजी के साथ चित्त को सभी चैतन्य केन्द्रो पर घुमाएं। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनों का अनुभव करें। (दो-तीन मिनट)
Dr. Aneel Kummar Barjatiyaa

Dr. Aneel Kummar Barjatiyaa

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