वास्तुशास्त्र एक प्राचीन शास्त्र हैं, जिसकी वेदों एवं पुराणों में भी विस्तृत चर्चा मिलती है। आज हमारे प्राचीन आचार्यो द्वारा रचित ‘वास्तुशास्त्र ‘  का आधुनिक संदीर्भो में आकलन कर उससे लाभ भी उठाया जाने लगा है। आधुनिक आर्किटेक्ट भी अब वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों की उपयोगिता समझने लगे हे। ऐसा होना स्वाभाविक एवं पृथ्वी- इन पांच तत्वों को वास्तुशास्त्र में पंच महाभूत कहा गया है। उपरोक्त पांच तत्व सनातन हैं, मनुष्य ही नहीं, संपूर्ण प्राणी जगत एवं जड़ जगत पर भी प्रभाव डालते है। वास्तुशास्त्र प्रकृति के साथ सामंजस्य एवं समरसता रखकर भवन निर्माण के सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। ये सिद्धांत मनुष्य जीवन से गहरे  जुड़े हैं। जैसे वास्तुशास्त्र में पूर्व या उŸार-पूर्व अर्थात् ईशान दिशा का अत्यधिक महत्व है। पूर्व का क्यों महत्तव  है। यह इसलिए कि पूर्व में ही सूर्य हमें उदित होता दिखायी देता है। जीवन के लिए सूर्य कितना अह्म है, यह मनुष्य प्राचीनकाल से ही जानता आया है। पौराणिक कथा के अनुसार श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने, जो शाप वश कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गया था, सूर्य की ही पूजा कर पुनः अपनी सुंदर देह प्राप्त की थी और पूर्णतः निरोग हुआ। वास्तुशास्त्र में भी  सूर्य एवं अन्य शेष तत्वों का इसीलिए महŸव है, क्योंकि उनकी सकारात्मक ऊर्जाएं जीवन विषादमय कर देती है।

एम जर्मन वैज्ञानिक डा. हार्टमोन ने एक ऐसा एंटेना बनाया, जिससे ज्ञात हुआ कि पृथ्वी की सतह से निकलने वाली ऊर्जा रेखाएं समूचे पृथ्वी मंडल को आवृत किए होती है। इनका झुकाव उत्तर-दक्षिण दिशाओं की ओर होता है। इस दिशा में 2 मीटर के अंतराल में निकलती है, जबकि पूर्व-पश्चिम दिशा में 2.5 मीटर के अंतराल में। ये एक वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण करती हैं, इसे बायो इलेक्ट्रो मैग्नेटिक फील्ड (बी.ई.एम) कहा जाता है। ऐसे बीस बी.ई.एम. का पता चला हैं, जिनमें चार मनुष्यों  के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने गये हैं। वास्तुशास्त्र के रचियताओं को इन सबका ज्ञान था। आज एक बायोमीटर की सहायता से इन ऊर्जा क्षेत्रों को बी ओ वी आइ एस (बोविस) एकक या यूनिट में मापा जाता है। उदाहरण के लिए मानव शरीर में 6,500 बोविस होते हैं। इसी तरह एक बौद्धस्तूप ने 12000 बोविस ऊर्जा का विकिरण किया तो क्रास ने 11,000 बोविस ऊर्जा का। इन्हीं सबके आधार पर वास्तुशास्त्रियों ने आवास गृह में शुभ-अशुभ क्षेत्रों का निर्धारण किया।

यह सत्य है कि किसी भी भवन का निर्माण शत-प्रतिशत वास्तु नियमों के अनुसार करना आज संभव-सा नहीं हैं, तथापि वास्तुविद् मानते हैं कि यदि सत्तर प्रतिशत भवन भी वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार बनवाया जाए तो जीवन स्वस्थ-सुखी रहता है। त्वरित निर्माण  करने की क्षमता प्राप्त होती है। बच्चों के जीवन का स्तर ऊंचा हो जाता है। व्यापार एवं नौकरी में भी तरक्की होती है। ऐसे भवन में वास, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता सुनिश्चित करता है। वास्तुशास्त्र पर विभिन्न  भाषाओं में अनेंकों पुस्तकें उपलब्ध है। यह भी वास्तुशास्त्र की बढ़ती उपयोगिता एवं लोकप्रियता का प्रमाण है।

Dr. Aneel Kummar Barjatiyaa

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