वास्तुशास्त्र एवं योगशास्त्र

वास्तुशास्त्र में ऊर्जा प्रवाहों का अतिशय महत्व है। ‘वास्तु‘ अर्थात् घर में वास कर रहे वास्तु-पुरूष के साथ तो पैंतालीस देवगण जुड़े हुए है। ऊर्जा प्रवाहों के संदर्भ में वास्तुशास्त्र के मध्य गहरा संबंध भी है और इस संबंध का आधार यही सनातन मान्यता है कि जो पिंड में है वही ब्रह्माण्ड है और जो ब्रह्माण्ड में है, वही पिंड में है। योगशास्त्र मनुष्य शरीर में तीन मूलभूत ऊर्जा प्रवाहों का सिद्धांत प्रतिपादित करता है। ये है।

इड़ा- जिसे चन्द्र नाड़ी कहा जाता है।

पिंगला- जो सूर्य नाड़ी के नाम से जानी जाती है और,

सुषुम्ना- अर्थात् ब्रह्म नाड़ी।

इनमें से इड़ा अर्थात् चन्द्र नाड़ी का संबंध उत्तर एवं पूर्व दिशाओं में है। यह नाड़ी इन्हीं क्षेत्रों को नियंत्रित करती है।  समस्त सृजनात्मक कार्यकलापों, भौतिक सुख-शांति, समृद्धि, कला, साहित्य, संगीत, शोध, धार्मिक प्रवृतियों एवं गतिविधियों, इन सबका स्रोत इड़ा नाड़ी अर्थात् चन्द्र नाड़ी को माना गया है। पंचेन्द्रियों के सुख का भी यही स्रोत है।

स्वरशास्त्र के अनुसार इड़ा नाड़ी की सक्रिय अवस्था में ही समस्त शुभ कार्यो को आरंभ किया जाना चाहिए। महत्वपूर्ण निर्णय भी इस नाड़ी के चलते किये जाने चाहिए।

वास्तुशास्त्र में भवन निर्माण के सिद्धांतों में कहा गया है कि किसी भी भूखंड पर आवास-निर्माण इस तरह किया जाए कि पूर्व एवं उत्तर में  अतिरिक्त भूमि बची रहे। ऐसा करने पर प्राणिक ऊर्जा के प्रवाह से उस आवास में रहने वाले सभी लोग लाभान्वित होते हैं। वास्तु पुरूष मंडल में सोम अर्थात् चन्द्र को उत्तर दिशा का देवता माना गया है।

ज्योतिष शास्त्र में भी कुंडली में उत्तर की ओर स्थित चतुर्थ भाव को सुख स्थान माना गया है तथा नैसर्गिक कुंडली में यहां कर्क राशि होती है, जिसका स्वामी चन्द्र है। वास्तु शास्त्र में भी यही सिद्धांत परिलक्षित होता है। वास्तुशास्त्र कहता है कि आवासों का प्रवेश द्वार उत्तर और पूर्व  दिशाओं में होना चाहिए। ये दिशांए देवताओं की है। उनकी ऊर्जा रूपी कृपा सतत मिलती रहे, इसलिए यथासंभव इन दिशाओं के क्षेत्र को खुला रखना चाहिए। इस तरह उतर एव पूर्वी दिशाओं से संबधित इड़ा नाड़ी की ऊर्जा को वास्तुशास्त्र मे स्वीकार किया गया है।

दूसरी ओर सूर्य  नाड़ी अर्थात् पिंगला का संबंध दक्षिण एवं पश्चिम से है। पिंगला का कार्य है सूर्य जलन अर्थात् रजस क्रिया। ज्योतिष शास्त्र में नैसर्गिक कुंडली के दशम  भाव मे मकर राशि होती है। जिसका स्वामी शनि हे। शनि को पश्चिमी दिशा पर भी अधिकार प्राप्त है। दक्षिण दिशा यम की भी मानी गयी है। दक्षिण-पश्चिम दिशा में अधिकाधिक खुला स्थान रखने  का अर्थ है, शनि की नकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित करना।

दक्षिण एवं पश्चिम दिशा का संबंध पिंगला अर्थात् सूर्य नाड़ी से हैं इन दिशाओं का प्रवाह मनुष्य के लिए घातक कहा गया है। पिंगला नाड़ी के चलते नये कार्य के आरंभ को, प्रस्थान को हानिप्रद माना गया है।

वास्तुशास्त्र इन दिशाओं में कम से कम खुला स्थान रखने एवं भारी-भरकम निर्माण करने का निर्देश देता है ताकि पिंगला-प्रवाह को रोका जा सकें तथा आवास में सकारात्मक ऊर्जा को बनाएं रखा जा सके। योगशास्त्र  में सुषुम्ना के प्रवाह के दौरान धर्म, ध्यान, समाधि आदि के माध्यम से कुंडलिनी-जागरण की विधि सर्वविदित है।

Dr. Aneel Kummar Barjatiyaa

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